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Inner Peace

 
 

मैं सत्य रूप में ही मनुष्य को सब कुछ देने के लिये तत्पर भी रहता हूँ : भगवान

दिव्य ज्योति पृष्ठ संख्या 78 से 80 तक साभार अवतरित स्वयं में क्या है, जैसा है, क्या उसे होना चाहिये? अपने ही मूल्यांकन का दृष्टि-कोण, स्वयं उसके अपने मूल्यों को, किस तरह घटाता हुआ सिद्ध कर देता है, कि उसका अपना मूल्य जिस तरह जिस रूप में वह आज तक समझता रहा, वैसा उसमें कुछ भी नहीं है। समय रहते क्या होने जा रहा है, यह तो मैं बताता भी जा रहा हूँ; और यह भी बता रहा हूँ कि किस तरह, कहाँ पर अपनी अपूर्णता को दूर करके, स्वयंRead More


संबंधों के नाम पर अपनी चिता कब तक जलाते रहोगे?

sambandho ke naam par kab tak apni chita jalate rahoge

अध्याय – २५ : संबंधों के नाम पर अपनी चिता कब तक जलाते रहोगे? २३ मई १९९४ सत्य मनुष्य की शक्ति भी है, शान्ति भी। यह मनुष्य का अपना ही अविश्वास और असत्य से जुड़ा मन होता है, जिसके कारण वह जीवन भर अशक्त भी रहता है, अशान्त भी। हरेक, जो भी भक्ति करता है वह अपनी भक्ति का आधार जिसे भी बनाता है अथवा उस आधार पर ही, अपने आपको उसका भक्त भी कहता है, मगर यदि पूछा जाये कि उसकी भक्ति का कारण क्या है, (तो) वह यहRead More