मानसिक शुद्धि
आत्म-बोध का मार्ग: शरीर, धर्म और ईश्वर के प्रति समर्पण

आत्म-बोध का मार्ग: तुम्हारे अपने शरीर तो तुम्हारे ही काम नहीं आते। मेरे लिये तो पहले भी प्रयोग नहीं करते हो। तो जो तुम्हारा होता है वह तुम्हारे लिये व्यय भी होता है। तुम्हारे लिये ही कर्म करता हुआ भी क्षीण होता रहता है। क्षीण होते-होते शून्य होने की स्थिति में आ जाता है; और एक दिन शून्य हो जाता है, वह ऐसा शून्य हो जाता है कि संसार में उसकी तो स्मृति भी मिटती चली जाती है। पुस्तक का यह अंश इस गहरे विचार से शुरू होता है किRead More
मैं मनुष्यों के भीतर और बाह्य सभी रूपों को हर क्षण देखता-पहचानता रहा हूँ : भगवान

आज का समय एक रावण का नहीं, अनेकों रावणों से भी बढ़ कर राक्षसों का है। वे जब-जब आयेंगे, भेष बदल कर ही आयेंगे।
विश्वास कभी असत्य में नहीं बदलता

दिव्य ज्योति (भगवान की वाणी) अध्याय-६ (२२ अगस्त, १९९४)व्यक्ति को पहचान कर ही उस पर अपना विश्वास दो। हर व्यक्ति इतना विश्वसनीय भी नहीं है कि उसे सभी कुछ इस तरह समझ और दे दिया जाय कि उसके पश्चात् मन से निर्भय और निश्चिन्त हो सको। मनुष्य में असत्य ही अधिक होता है। सत्य बहुत ही कम होता है और जितना कम सत्य होगा, उसी रूप में मनुष्य का मन और कर्मों का रूप होगा। जब मन में असत्य अधिक होता है, तो उसे सभी कुछ असत्य जैसा ही अशक्तRead More
अध्याय-७ समय बढ़ते रोगों की श्रृंखला का

पल-पल अपनी वाणी को जिस जिह्वा से तोड़ते रहते हो यह तुम्हारी जिह्वा रोगी हो जाती है। तुम्हारी इच्छा असत्य छोड़ने की ही नहीं वाणी की मर्यादा तोड़ना, दोष जैसा न भी लगता हो, मगर यह मर्यादा जब टूटती है या तोड़ी जाती है (पृष्ठ ५२) तब जीवन का रूप क्या होता है, यह देखने के लिये भी अभी से मानसिक रूप से तैयार रहो क्योंकि शरीर में असत्य के, अविश्वास के हिंसक जीवन के दोषों व अपराधों का घर बना हुआ है। यह तो वह कचरा ही है, जो जब सड़ता है, तो शरीर को रोगी बना देता है। यह बार-बार मेरे बताए जाने के बाद भी समझे कहाँ हो?
