अध्याय-७ समय बढ़ते रोगों की श्रृंखला का

संकलन : साभार दिव्य ज्योति (भाग 7) / भगवान की वाणी
प्राप्ति स्थान : सिद्ध शक्ति पीठ सत्य मंदिर, बी 116/2, इंदिरा नगर, लखनऊ
संदेश : प्रत्येक रविवार, शाम 5 बजे से 8 बजे तक – दिव्य आध्यात्मिक सत्संग
आध्यात्मिक गुरु शक्ति माँ पूनम जी एवं
दिव्य शक्ति योगिराज अभिनव जी के पावन सान्निध्य में
अध्याय-७: समय बढ़ते रोगों की श्रृंखला का
(२३ अगस्त, १९९४)
यह तो मैं पहले भी कह चुका हूँ कि सत्य तुम्हारे जीवन का धर्म और धर्म तुम्हारे जीवन में मेरा दिया ‘विश्वास’ हो। तभी सत्य जीवन की मर्यादा और धर्म तुम्हारे जीवन में विश्वास का रूप ले सकता है, और इसके लिये वाणी ही वह साधन है, जो अगर तुम्हें मेरे दर्शन की सत्यता के रूप में विश्वास देती है, तो तुम्हारी अपनी वाणी की मर्यादा को टूटने नहीं देगी।
पल-पल अपनी वाणी को जिस जिह्वा से तोड़ते रहते हो यह तुम्हारी जिह्वा रोगी हो जाती है। तुम्हारी इच्छा असत्य छोड़ने की ही नहीं वाणी की मर्यादा तोड़ना, दोष जैसा न भी लगता हो, मगर यह मर्यादा जब टूटती है या तोड़ी जाती है,
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तब जीवन का रूप क्या होता है, यह देखने के लिये भी अभी से मानसिक रूप से तैयार रहो क्योंकि शरीर में असत्य के, अविश्वास के हिंसक जीवन के दोषों व अपराधों का घर बना हुआ है। यह तो वह कचरा ही है, जो जब सड़ता है, तो शरीर को रोगी बना देता है। यह बार-बार मेरे बताए जाने के बाद भी समझे कहाँ हो?
रोगी को रोग-ग्रस्त करती मेरी शक्तियाँ, मेरे क्रोध की पहचान बनेंगी।
तुम्हारी दृष्टि और बुद्धि में तो इसका कोई भी रूप है ही नहीं। जहाँ भी गंदगी होगी, वह हानिकारक तो होगी ही। संसार भर की गंदगी साफ कर डालो, मगर जब तक तुम्हारे मनों में यह बसी हुई है, स्थान नहीं छोड़ रही है, या फिर अपने रक्त में ऐसा घोल रखा है (इसे), कि तुम्हें पहचान पाना ही मुश्किल हो रहा है, तो अवसर
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मैंने दिया था तुम्हें, उसे पहचानने का भी और छोड़ने का साधन भी बताया ही था। मगर स्वयं को अनपहचाना रख कर, क्या स्वयं को ठीक रख पाओगे? दोष-युक्त मन पर भी, क्या रोग-मुक्त हो पाओगे?
समय जब बढ़ते हुये रोगों की श्रृंखला का आ रहा है; जीवन की शक्तियाँ जो क्षीणता की ओर बढ़ती हुई भी, अभी तुम्हारी पहचान नहीं बनीं थीं, अब निकट आती हुई रोगी को रोगग्रस्त बनाकर ही शरीर में मेरे क्रोध की पहचान बनेंगी।
मनुष्यों को जो अपराधी और दोषी हैं, उन्हें किसी न किसी रूप में भयंकर संघर्षों में पड़कर, मरना तो है ही।
वे संघर्ष तुम्हारे मन के अन्दर के असत्य के और मेरी वाणी के अक्षरों में बसे सत्य के उस ज्वलंत रूप को देखकर, तुम्हारे अन्दर पैदा होने वाले भय से ही हो, तो भी क्या? संघर्ष तो होना ही है; और हर संघर्ष का परिणाम असत्य का विनाश (पृष्ठ ५४) सत्य की विजय है। यह संघर्ष रोगों से शरीर का होगा। यह संघर्ष संसार में अपने असत्य को वचनों और कर्मों का रूप ले कर बढ़ते हुये शरीरों का होगा।
जो जब भी अपने असत्य की कुल्हाड़ी से सत्य को काटने के लिये बढ़ेंगे, उसकी तेज धार स्वयं उनके ही अंग-भंग कर देगी।अन्यों की, असहायों और असमर्थों की हत्या करने के लिए बढ़ते हुये हाथ, किस तरह कब काट दिये जायेंगे,
उनकी शक्ति को क्षीण करने वाली, अपंग बनाने वाली शक्ति का, चाहो या न चाहो, दर्शन तुम्हारे (हटाये) से हटेगा नहीं, क्योंकि मैं किस तरह सर्वव्यापक हूँ और किस तरह मेरी शक्ति भी चारों और कण-कण में व्याप्त है, यह भी देखोगे ही।
संघर्ष रोगों का और तुम्हारे बीच होगा। संघर्ष संसार में चारों ओर व्याप्त मेरी शक्ति रूप से (पृष्ठ 55) तुम्हारे द्वारा फैलाये जाते हुये असत्य, अविश्वास और अधर्म के कर्मों से होगा, जो उन रूपों में तुमसे ही होगा।
आज मेरी इस शक्ति के दर्शन को, सम्पूर्ण रूप से वही जान पायेगा या वही जाना हुआ कहा भी जायेगा, जो इसे पहचान कर इसका लाभ उठा सके; और मेरी पहचान के लाभ रूप में पहचाना जा सके।
मेरी शक्ति को दिया तुम्हारा सभी कुछ, तुम्हारे अपने लिये अलग ही प्रकार से अपनी पहचान देगा। मगर यह जब स्वयं तुम्हारी पहचान सत्य रूप में होगी तभी तो।
आज के बढ़ते रोगों से कोई बच नहीं पायेगा। समय अब उन्हीं रोगों की वीभत्सता का ही आरम्भ हुआ है। मेरा तो यही रूप है संसार में फैले असत्य का कचरा साफ करके सत्य और धर्म के संस्थापन का।
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