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जीवन ऊर्जा

 
 

विश्वास कभी असत्य में नहीं बदलता

divyajyoti bhag7

दिव्य ज्योति (भगवान की वाणी) अध्याय-६ (२२ अगस्त, १९९४)व्यक्ति को पहचान कर ही उस पर अपना विश्वास दो। हर व्यक्ति इतना विश्वसनीय भी नहीं है कि उसे सभी कुछ इस तरह समझ और दे दिया जाय कि उसके पश्चात् मन से निर्भय और निश्चिन्त हो सको। मनुष्य में असत्य ही अधिक होता है। सत्य बहुत ही कम होता है और जितना कम सत्य होगा, उसी रूप में मनुष्य का मन और कर्मों का रूप होगा। जब मन में असत्य अधिक होता है, तो उसे सभी कुछ असत्य जैसा ही अशक्तRead More


अध्याय-७ समय बढ़ते रोगों की श्रृंखला का

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पल-पल अपनी वाणी को जिस जिह्वा से तोड़ते रहते हो यह तुम्हारी जिह्वा रोगी हो जाती है। तुम्हारी इच्छा असत्य छोड़ने की ही नहीं वाणी की मर्यादा तोड़ना, दोष जैसा न भी लगता हो, मगर यह मर्यादा जब टूटती है या तोड़ी जाती है (पृष्ठ ५२) तब जीवन का रूप क्या होता है, यह देखने के लिये भी अभी से मानसिक रूप से तैयार रहो क्योंकि शरीर में असत्य के, अविश्वास के हिंसक जीवन के दोषों व अपराधों का घर बना हुआ है। यह तो वह कचरा ही है, जो जब सड़ता है, तो शरीर को रोगी बना देता है। यह बार-बार मेरे बताए जाने के बाद भी समझे कहाँ हो?