दिव्य शक्ति योगीराज अभिनव जी
अवतार संपूर्ण दैवी-भाव ही नहीं, दैवी-शक्ति का संपूर्ण रूप होता है!

दैवी और आसुरी वृत्तियों के विषय में भगवान के शब्द अब बताता हूँ तुम्हें वह, जो मैं कल से तुम्हारे विषय में अर्थात् प्राणी-मात्र के विषय में बता रहा हूँ, तुम्हारे अन्दर की दैवी और आसुरी वृत्तियों के विषय में। दैवी भावनाओं के विषय में तुम्हें बताया ही है कि आज के संसार में संपूर्ण दैवी-भाव-संपन्न तो तुम मनुष्यों के बीच मिलना ही असंभव है। मात्र मेरा भक्त, जो मेरे द्वारा ही स्वीकृत हो पाता है; या फिर जिसे मैंने अपने भक्त के रूप में, एक भक्त के रूप में,Read More
सत्य सदा सत्य ही होता है, जो सत्य ही स्वीकार करता है

भगवान की वाणी — मूल पाठ (Transcription) अध्याय-३१२ : सत्य का महत्व. २७ अगस्त १९९८ “सत्य सदा सत्य ही होता है, जो सत्य ही स्वीकार करता है, असत्य को स्वीकार भी नहीं करता है । सत्य का भक्त जब सत्य की मर्यादा से बँधा जीवन जीता है, तब असत्य का कोई भी स्थान अथवा महत्व उसके जीवन में नहीं होता है । मेरी भक्ति और पूजा करने के पहिले, स्वयं ही समझो कि क्या ‘सत्य का महत्व’, आज भी समझे हो ? जब तुम्हारी आसक्ति, आज भी असत्य से बँधीRead More
अंधविश्वास नहीं विवेक ही सच्ची भक्ति है | Spiritual Guidance for Life

संघर्षों पर विजय – अध्याय – 12 Spiritual Guidance for Life : अंधविश्वास नहीं विवेक ही सच्ची भक्ति है सतर्क रहना है समझदार रहना है, यह भी एक भक्ति है आँखें मूंद कर नहीं रहना है। भक्ति करने का अर्थ यह भी नहीं है कि हम बिल्कुल ही नादान बन जाये, यह हम समझते हैं। कोई भी आकर आपको कुछ भी समझा जाये या कुछ भी बन जाये, कहीं न कहीं जब आपमें विवेक है, तभी आप भगवान के भक्त हैं तो हमें सतर्क रहना है समझदार रहना है, यहRead More
आत्म-बोध का मार्ग: शरीर, धर्म और ईश्वर के प्रति समर्पण

आत्म-बोध का मार्ग: तुम्हारे अपने शरीर तो तुम्हारे ही काम नहीं आते। मेरे लिये तो पहले भी प्रयोग नहीं करते हो। तो जो तुम्हारा होता है वह तुम्हारे लिये व्यय भी होता है। तुम्हारे लिये ही कर्म करता हुआ भी क्षीण होता रहता है। क्षीण होते-होते शून्य होने की स्थिति में आ जाता है; और एक दिन शून्य हो जाता है, वह ऐसा शून्य हो जाता है कि संसार में उसकी तो स्मृति भी मिटती चली जाती है। पुस्तक का यह अंश इस गहरे विचार से शुरू होता है किRead More
