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अवतार संपूर्ण दैवी-भाव ही नहीं, दैवी-शक्ति का संपूर्ण रूप होता है!

दैवी और आसुरी वृत्तियों के विषय में भगवान के शब्द

अब बताता हूँ तुम्हें वह, जो मैं कल से तुम्हारे विषय में अर्थात् प्राणी-मात्र के विषय में बता रहा हूँ, तुम्हारे अन्दर की दैवी और आसुरी वृत्तियों के विषय में।

दैवी भावनाओं के विषय में तुम्हें बताया ही है कि आज के संसार में संपूर्ण दैवी-भाव-संपन्न तो तुम मनुष्यों के बीच मिलना ही असंभव है। मात्र मेरा भक्त, जो मेरे द्वारा ही स्वीकृत हो पाता है; या फिर जिसे मैंने अपने भक्त के रूप में, एक भक्त के रूप में, जिसे मेरे लिये ‘कर्म करना निर्णय के रूप में दिया होता है, वह दैवी-भाव-संपन्न ही कर्मठ और कर्मयोगी के रूप में, आने वाले हर समय में ही पहचाना जाता है।

इसके अतिरिक्त वह जो मेरी शक्ति के अवतरित रूप में संसार में जाना जाता है। आने वाले हर युग में लोग जिसे मेरा अवतार कह कर, मेरी पूजा का स्थान देते हैं। वह संपूर्ण दैवी-भाव ही नहीं, दैवी-शक्ति का संपूर्ण रूप होता है।

अवतार की समता करने का प्रयत्न ही मूर्खता होती है!

उसकी समता करने का प्रयत्न ही मूर्खता होती है, क्योंकि उसकी समता अन्य कोई कर ही नहीं सकता।

जानते ही हो कि अवतार रोज़ ही नहीं पैदा होते। किसी एक युग में, कभी ही, कोई एक अवतार, पैदा होता है और पूजा जाता है। मेरी ही भाँति, मेरा ही नाम पाते हुये वह एक होता है, उसकी समता कभी पाने का प्रयत्न भी मात्र तुम्हारी अपनी बुद्धि का तुम्हारे लिये ही छलावे का रूप होगा।

शीघ्र ही सभी देखेंगे कि संसार में उसकी विशिष्टता किस रूप में है; और वह विशिष्टता अगर उसकी मात्र शक्ति-रूप में है, जिसे सभी पहचानेंगे, मगर वह स्वयं हर अभिमान, अहंकार, लोभ-माया, आकर्षणों के बीच रहते हुये, सभी से मुक्त, किस तरह, किस सरलता और सहजता से मेरी शक्ति का परिचय देती हुई, अनेकों के कल्याण का कारण बनती है। इसलिये सभी में मेरी अवतरित चेतना नहीं होती।

स्वयं को अवतार कहने की प्रथा को धर्म बनाकर, नये ही धर्म का प्रचार करते हुये व्यापार करना और व्यापारिक बुद्धि को धर्म का आधार बनाना, स्वयं को ही विनाश की ओर ले जाना है।

मेरी वे दिव्य शक्तियाँ

जिस तरह संसार में जब भी जो उपलब्धि हो, मनुष्य को प्रयत्न करना चाहिये, उसे पाने का; दैवी और आसुरी (आसुरी शब्द स्पष्ट है) कम या अधिक मात्रा में, सभी के पास पहले में ही थी। मगर आज बता ही चुका हूँ कि संसार में अवतरित हुई हैं, मेरी वे दिव्य शक्तियाँ, जो मेरे अवतरण के समय ही मेरी शक्ति के अवतरित रूप के साथ ही, संसार में अवतरित होती हैं।

ये भी संसार के कल्याण के लिये ही आती हैं। उस दिव्य शक्ति की अर्चना-पूजा भी मनुष्य को दिव्यता की ओर ले जाती है। मगर कठिनाई है तो स्वयं मनुष्य की अपनी बुद्धि के कारण ही; क्योंकि वह सभी से स्वयं को ही ऊँचा जानता है।

अगर दिव्य-शक्तियों का अवतरण न हो, तब उस अवतरित शक्ति के साथ-साथ ही, उसका अधिकार और शक्ति भी, कौन मानेगा; क्योंकि संसार में जब हर ओर रहती है, तभी कोई नहीं पहचानता है। मगर अवतरित चेतना के साथ अवतरित होती हुई वे भी, संसार में मनुष्य के द्वारा पहचानी जाती हैं।

रस्सी उसी तरह दिव्य शक्ति रूप होती है, पात्र भक्त होता है

जिस तरह जल तो कुएं में होता है, मगर कुओं से जल निकालने के लिये किसी पात्र की आवश्यकता होती है। वह पात्र लोटा, कलसा, या फिर बाल्टी हो, मगर बिना उसके हुये तो, जल नहीं मिलता।

इसी तरह आवश्यकता होती है रस्सी की भी, जो जब पात्र में बाँधी जाती है; और वह रस्सी उस पात्र को जल तक ले जाती है, और वही रस्सी ऊपर लाती है। मगर उस रस्सी को बाँधने और जल लाने भेजने वाले उस पात्र का भी कोई कारण होता है और वहीं कारण रूप में, मैं होता हूँ।

रस्सी उसी तरह दिव्य शक्ति रूप होती है, पात्र भक्त होता है, जो जल को भर कर, रस्सी का सहारा ले कर ही, ऊपर लाता है।

आज जब तक (मनुष्य) उस रस्सी को ही नहीं जानता है, तब तक वह भक्त भी कहाँ पहचाना जायेगा।

मेरी अवतरित भगवत् चेतना

आज तो अभी तुम मनुष्यों की बुद्धि मेरी अवतरित भगवत् चेतना के रूप में उस शक्ति को ही नहीं पहचान सकी है, जो शीघ्र ही संसार के सामने अपने अनुपमेय रूप में ही पहचान दी जायेगी, जिसका नाम और यश संसार में दूर-दूर तक फैलता हुआ, चारों ओर के अंधकार को अपने प्रकाश से भरता जायेगा।

उन पावन रूपों को भी पहचानो, जो तुम्हारे जीवन में वह सब कुछ दे रहे हैं। (वे) पा रहे हैं भगवत् शक्ति से; और साधन बन कर, तुम्हें रास्ता और साधन दे रहे हैं, जीवन को सफल और सार्थक बनाने के लिये और मुझ तक पहुँचाने के लिये।

(नोट: भगवान की वाणी के दिव्य ज्योति भाग 11 के पृष्ठ सं.62-66 तक से साभार लिया गया।)






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