जब मैं रोग देता हूँ, तब उस रोग की कोई दवा नहीं होती : भगवान

मेरे रूपों की गणना कोई भी नहीं कर सकता है।
अध्याय – १४ : तुम्हारी वाणी में मेरा वास है (१४ अक्टूबर, १९९४)
तुम्हारे जीवन के हर पग पर, अपने साथ, अपनी शक्ति, संबल और जीवन की हर बाधा को समाप्त करके सुखी, शान्त और यशस्वी दृढ़ जीवन का ही आशीर्वाद देता हूँ।
जीवन में कहीं भी, एक भी लिया हुआ तुम्हारा निर्णय, कभी अधूरा या अपूर्ण और व्यर्थ नहीं होगा।
तुम्हारी वाणी में तो मेरा ही वास है
तुम्हारी वाणी में तो मेरा ही वास है, फिर किसी भी रूप में क्या कभी तुम्हारी वाणी, तुम्हारा भाव भी रूप में क्या कभी तुम्हारी वाणी, तुम्हारा भाव कभी व्यर्थ या असत्य हो सकता है। अपने भावों में मेरा बल और अपनी वाणी में मेरा सत्य पाऊँगा।
आसुरी शक्तियों के परास्त होने का समय आ गया है
मैं जीवन में जिस रूप में आया हूँ, वह रूप ‘भगवद्दर्शन’ के रूप में ही जाना जायेगा। आसुरी शक्तियाँ, वे किसी रूप में हों, अब उनके परास्त होने का समय आ गया है। जो तुम्हारे जीवन में अब तक कोई न कोई रूप लेकर, किसी भी रूप में, सामने आ रही थीं, उनके मेरा वचन है कि अब उनके रूपों को समाप्त होते ही देखोगे।
जीवन असत्य की कठोर शिला पर तपता हुआ भी सत्य की पूजा और साधना करता रहा है। यही तो सत्य के भक्त के से भी मैंने चाहा है। तुम्हारा जीवन तो इसीलिए आया ही था।
भक्त और मैं दोनों ही सत्य को संस्थापित करने के लिये, साधना करते हैं
किन्तु भक्त और मैं दोनों ही संसार में अवतरित होकर जब इसी असत्य की धरती पर जन्म लेकर, सत्य के लिये, सत्य को संस्थापित करने के लिये, साधना करते हैं, तभी तो वह असत्य, चाहे जितनी न जमा चुका हो, वह कठोर शिला चाहे जितनी भी तपती क्यों न रहे, मगर धीरे-धीरे उसकी अग्नि, उसका ताप, पिघलता शान्त हो जाता है।
शीघ्र ही उस असत्य का पिघलना और सत्य का उभरता रूप भी देखोगे।
सागर की लहरों को और भी जहाजों को निगलते हुए देखो
शीघ्र ही उस असत्य का पिघलता और सत्य का संवरता रूप भी देखो। शीघ्र ही सागर की लहरों को और भी जहाजों को निगलते हुए देखो। जो हो रहा है वह भी तो क्या किसी के द्वारा हो रहा है, कोई इन स्थितियों में किसी को समाप्त होने में बचा सकता है या जिसे नहीं समझा है, उसे क्या कोई मार सकता है?
जो मैं चाहता हूँ, वह किस तरह होता है यह, तो मैं तुम्हें स्वयं ही बताता चल रहा हूँ। उसके पश्चात भी अगर कुछ भी मनुष्य को समझना मुश्किल दिखाई दे, तो भविष्य भी असुरक्षित ही मानना।
सत्य का भक्त, हर कष्ट, हर समस्या को झेल कर भी, असत्य को स्वीकार नहीं करता, बल्कि उसका सामना करने के लिये, अबाध गति में बढ़ता रहता है।
यह जीवन मनुष्य का हो या पशु-पक्षियों, कीट-पतंग का, मगर है तो मेरी ही रचना। जिसका जिस रूप में प्रयोग करने हो उसका वही अर्थ बन जाता है। उस अर्थ को बिना समझे ही मनुष्य असत्य के मार्ग पर उतना ही सक्रिय और सुदृढ़ हो कर बढ़ता है, जितना सत्य का भक्त, सत्य पर विश्वास करने वाला, हर कष्ट, हर समस्या को झेल कर भी, असत्य को स्वीकार नहीं करता, बल्कि उसका सामना करने के लिये, अबाध गति में बढ़ता रहता है।
पशु-पक्षियों ‘भोग-योनि’ कहलाते हैं, उनके कर्मों की गणना नहीं होती है।
किन्तु वह जिस रूप में बढ़ता है, वह रूप तुम मनुष्यों का ही तो होता है। जिस तरह का जीवन आज मनुष्यों का हो रहा है, उस तरह के जीवन से तो, पशु-पक्षियों का जीवन पाना ही सौभाग्य मानो, क्योंकि पशु-पक्षी निर्दोष होते हैं। उसी रूप में वे ‘भोग-योनि’ कहलाते हैं, उनके कर्मों की गणना नहीं होती है।
वे कर्म जब करते हो, जो पशु भी नहीं करता, तब तो तुम पशु बनने के योग्य भी नहीं रहते।
मनुष्य कहलाते हुए फिर भी वे कर्म जब करते हो, जो पशु भी नहीं करता, तब तो तुम मनुष्य तो क्या, पशु बनने के योग्य भी नहीं रहते।
आज जिस अमूल्य जीवन को लुटाये जा रहे हो
समझो कि जीवन को अगर पाया है, तो यह व्यर्थ न हो जाय। आज जिस अमूल्य जीवन को लुटाये जा रहे हो, वह अब जिसे तुम मूल्यवान मानते भी हो, वह जीवन समाप्त करके मूल्यहीन बना भी देते हो।
असत्य का जीवन जीने वाले की शक्तियां घटती जायेंगी और जीवन स्वयं भार-रूप सा लगने लगेगा।
वह जीवन जिस पर अभी तक गर्व करते रहे, वह जीवन तुम्हारे लिये व्यर्थ ही रहेगा। असत्य का जीवन जीने वाले की शक्तियां घटती जायेंगी और घटते-घटते इस सीमा पर पहुंच जायेंगे कि तुम्हारा जीवन स्वयं भार-रूप सा लगने लगेगा। इस जीवन का प्रयोग असत्य के लिये, सत्य को कष्ट देने या विनाश करने के प्रयत्न करने योग्य ही नहीं रहेगा।
शीघ्र ही देखो एक और रोग की श्रृंखला किस तीव्रता से बढ़ती हुई आ रही है, जो समझी और पहचानी न जा सकती हुई भी एक नाम पाती जायेगी, और उस नाम से भी क्या प्रयोजन?
रोगों की श्रृंखला भी तो उन्हीं की बेड़ी बन कर सामने आ रही है, जो असत्य पर अपना दृढ़ विश्वास रखते हैं
मगर यह रोगों की श्रृंखला भी तो उन्हीं की बेड़ी बन कर सामने आ रही है, जो असत्य पर अपना दृढ़ विश्वास रखते हैं, अधर्म जिनका स्वभाव और गुण होता है, असत्य को जो अपना ही शक्ति मान कर चलते हैं, और सत्य पर आक्रामक होने के प्रयत्न करते रहते हैं।
असत्य की शक्ति पर विश्वास के सारे भ्रम टूट जायेंगे
शीघ्र ही मैं उनकी शक्ति को किस तरह समाप्त करके, उन्हें भी उस रूप का दर्शन देना हूँ कि जिसे देखकर उनके असत्य पर विश्वास और असत्य की शक्ति पर विश्वास के सारे भ्रम टूट जायेंगे।
जब मैं रोग देता हूँ, तब उस रोग की कोई दवा नहीं होती
रोगों का आना अभी तक अगर मनुष्य यही मानता है कि यह तो आते ही रहते हैं, या सब कुछ होता ही रहता है, तो यही भ्रम उसका टूटेगा कि जब मैं रोग देता हूँ, तब उस रोग की कोई दवा नहीं होती। मैं रोग जब देता हूँ, तो उसे मेरा निर्णय जानो और जब मैं निर्णय को काट सकने को शक्ति संसार को किसी भी बड़ी से बड़ी शक्ति में नहीं होती।
सत्य की शक्ति की ही शरण ही रक्षा कर सकेगी
इस सत्य के सागर में, जब असत्य का ही विषय घोला है, तब उसका प्रभाव तो, उन विष घोलने वाले के ही जीवन पर होना है।
उस सत्य की अवज्ञा करना ही स्वभाव अगर बनाया है, तो सत्य की शरण में आने के लिये विवश होना ही पड़ेगा। यही तो मेरी शक्ति का वह दर्शन होगा, जो कितना भी अहंकारी क्यों न हो, सत्य की शक्ति की ही शरण ही रक्षा कर सकेगी। इसीलिये अहंकार तोड़ कर ही आना होगा, और तुम्हारा अहंकार मैं किस प्रकार तोड़ता हूँ, यह तो स्वयं ही देखोगे।
(साभार दिव्य ज्योति वाणी खंड के पृष्ठ संख्या 100-105 से लिया गया है)
मुख्य केंद्र : सिद्ध शक्तिपीठ सत्य मंदिर, बी 116/2 इंदिरा नगर, लखनऊ
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