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गीता’ भी समझना मुश्किल हो तो आज धर्म को मेरे द्वारा दिये ज्ञान, मेरी वाणी में ही जानो. सबसे सीधा और सरल रास्ता है धर्म का : भगवान

अध्याय – १९

सम्बन्धों का अर्थ है, सत्य, प्रेम, विश्वास व त्याग की नींव पर बनी दीवारों को पकड़े, धर्म की छत से

(१९ अक्टूबर, १९९४)

मनुष्यों में सम्बन्ध इसलिये बनाये गये थे कि जिसके द्वारा मनुष्य अपनी मर्यादा में रह सके.

यह भी सत्य है कि जो संबंध, जिन्हें तुम्हारे संसार में सम्बन्ध कहा जाता है, वे मेरे बनाये नहीं हैं.

मगर इनको जिन्होंने भी आरम्भ में बनाया वे थे आरम्भ में जिन्होंने धरती पर मनुष्यों को किस तरह रहना चाहिये, किस धर्म का पालन करना चाहिये, समाज या परिवार का अर्थ क्या है और इन्हें किस रूप में होना चाहिये, इनके विषय में सारी रूप-रेखाएँ और धारणाएँ बनाई गईं, उनके द्वारा, जो सही ढंग से धर्म को समझ सकते थे.

मगर यह भी जानते थे कि मनुष्य-जाति का भविष्य कैसे बनता है, उसको किस तरह पाना चाहिये, इसके लिये ही उन्होंने मर्यादाओं और मान्यताओं को बनाया, पूजा और धर्म की रूप-रेखायें खींचीं. किन्तु मनुष्य ने उन सबका उल्लंघन करते हुए, उन सभी मर्यादाओं और मान्यताओं को तोड़ डाला. इनमें दोष उन्हीं का है, जो धर्म और समाज की बताई सारी (मर्यादाओं और मान्यताओं को तोड़) बैठे हैं.

आज भी और पहले भी, वास्तव में, हर किसी का यह अधिकार ही नहीं होता कि वह उस धर्म और समाज की रूप-रेखाओं के रूप में, मर्यादाओं की लकीर खींचे, जो मुझे ही नहीं जानता.

धर्म धरती पर कोई वस्तु नहीं है, न ही किसी चारदीवारी में सीमित कर देने का कोई रूप है, जिसे सीमित करके समझ लिया गया कि यही धर्म है.

जो मुझे जानता है, वही जान सकता है कि धर्म सीमित हो नहीं सकता। इसे सीमित किया ही नहीं जा सकता.

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धर्म उसी की रक्षा करता है, जो स्वयं धर्म की रक्षा करता है.

इसे सीमाओं में बाँधने के प्रयत्न करने वाले, नितांत मानवीय स्तर की दुर्बलताओं से भरे लोग थे, जिन्होंने अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया, और जानते ही हो कि धर्म उसी की रक्षा करता है, जो स्वयं धर्म की रक्षा करता है.

जो धर्म जानता ही नहीं, धर्म के रूप में किसी जाति और समाज के द्वारा निर्धारित नियमों को ही धर्म मान लेता है, वह तो भटकेगा ही.

धर्म यदि जानना है, तो जाओ उन प्राचीन ग्रन्थों की ओर, जो ‘वेद-उपनिषद’ आदि कहलाते हैं. इन्हें समझना मुश्किल हो तो जाओ ‘गीता‘ का धर्म जानो,

प्राचीन ग्रन्थों में धर्म अगर मेरे कृष्ण-रूप की पूजा करते हो, तब तुम्हारा विश्वास मात्र विश्वास के रूप में मेरे कृष्ण रूप में होने से ही पूरा नहीं हो जाता. कृष्ण-रूप में दिये धर्मोपदेश के रूप में ही है ‘गीता‘। तो अगर मेरे कृष्ण-रूप पर विश्वास हो तो ‘गीता’ को धर्म मानो.

मेरी वाणी में दिया ज्ञान, सबसे सीधा और सरल रास्ता है.

‘गीता’ भी समझना मुश्किल हो तो आज धर्म को मेरे द्वारा दिये ज्ञान, मेरी वाणी में ही जानो. सबसे सीधा और सरल रास्ता है धर्म का. इसमें कहीं कोई जटिलता और दुर्हता तो है ही नहीं कि समझ में न आ सके.

आज तुम्हारे सामने धर्म नहीं, सुख और ऐश्वर्य ही प्रमुख हो गये हैं.

आज तुम्हें भगवान की नहीं, किसी ऐसे साधन के रूप में, किसी उस महान-शक्तिशाली व्यक्तित्व की जरूरत है, जो तुम्हारी सारी आवश्यकताएँ पूरी कर सके, तुम्हारे कष्टों को दूर कर सके, और हर पल, तुम्हारे लिये ही, सुख की चिन्ता करता रहे.

इसी तरह संबंधों में तुम्हें वह चाहिये जिसके द्वारा तुम्हारी अपनी इच्छाओं, स्वार्थों, अहंकार और वासनाओं की सन्तुष्टि हो सके.

उसके साथ भी यह नहीं जानना चाहते हो कि उस सम्बन्ध का अर्थ क्या है? उसके द्वारा व्यक्ति मर्यादा के बँधन में बँधता है, और उन मर्यादाओं में भी जब तक, सत्य, प्रेम और विश्वास नहीं होता, त्याग नहीं होता, कोई भी सम्बन्ध, सम्बन्ध के नाम पर, किसी टूटे घर की इमारत की तरह ही खड़ा रह जाता है, जहाँ चारों ओर से जब आँधी-तूफानों के रूप में संघर्षों और कष्टों के झोंके आते हैं, उसका कष्ट सभी को उठाना पड़ता है.

सम्बन्धों का अर्थ, परिवार के रूप में, एक ऐसी विशाल अट्टालिका का होता है, जो सभी एक-दूसरे से जुड़ कर पूर्ण होते हैं, जिस पर कोई छत बना हुआ, वह होता है, जो धर्म को जानता हुआ, चारों ओर से, सभी दीवारों को पकड़े रहता है, अपनी जकड़ में, और सभी पर छाया करता रहता है.

सही अर्थों में यह छत धर्म की होती है. जिसकी छाया घर की उन दीवारों के लिये होती है, जो सत्य, प्रेम और विश्वास व त्याग की होती हैं.

जब छत धर्म की होती है, तब वह चारों दीवारों को मजबूती से अपने हाथों में पकड़े रहती है.

मैंने तो ऐसा ही धर्म, समाज और परिवार बनाया है.

इसलिए अगर परिवार बनाना चाहते हो, तो पहले देखो कि क्या एक ऐसा घर है, या ऐसा घर बना पाये हो, या बना लिया है, जहाँ धर्म की छत से जुड़ी हुई, सत्य, धर्म, विश्वास, प्रेम और त्यागम की दीवारें हों.

जब भी कहीं स्थिति द्विविधा की आये, पहले देखना कि तुम्हारा अपना परिवार, अपना घर, जिसे परिवार और घर कहते हो, उनकी नींव क्या है? वे किस नींव पर टिकी हैं? उन्हें किस सामग्री से बनाया गया है?

इस स्थान पर आवश्यकता होती है, पहले मनुष्य के मन की स्थिरता की ओर यह स्थिरता एक चिंता और अहंकार की हो, तो यह मन न समझना कि तुम्हारे मन में स्थिरता है.

यह अस्थिर ही रहता है, जब मन में अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या, अपना और पराया हो, स्वार्थ और इच्छाओं की पूर्ति की ओर मन भाग रहा हो.

ऐसे ही परिवार आज दुखों और कष्टों की सीमाओं में घिरे हुये हैं, जिनके पास सब कुछ है मगर मन में स्वार्थ, इच्छा, अहंकार ही मुख्य है.

यहाँ धर्म शब्द का कोई महत्त्व ही नहीं है. जब भी कहीं पर दुःख और चिन्ता का वास दिखाई दे, समझना कि वहाँ धर्म का वास नहीं है.

धर्म की छत डालने के पहले नींव मजबूत बनाओ. नींव उन्हीं सत्य, प्रेम, विश्वास और त्याग की ही होगी, तभी उन पर वैसी उन्हीं की दीवारें खड़ी हो सकेंगी.

कपड़ा अच्छा और मजबूत व महंगा हो, सिलाई करने वाला धागा अगर कमजोर होगा, तो कितना भी अच्छा कपड़ा बनाया होगा, मगर सिलाई खुल ही जायेगी. जब कपड़े के सभी हिस्से सिलाई खुल जाने से अलग हो जाने हैं, तब क्या उस कपड़े को कोई पहन पाता है?

जो अच्छा कपड़ा पहनना नहीं जानता, उसे अच्छा कपड़ा पहनाना भी बेकार होता है.

मैंने भी शरीर रूप में तुम्हें अच्छे-अच्छे वस्त्र पहनाये. मगर उसकी सुरक्षा तुम्ही नहीं कर पाये. रोज़ उसमें गंदे दाग अपने भावों, विचारों और कर्मों के लगाते रहे. तब कपड़े को इतना गंदा हो जाना ही था कि यह किसी भी साधन से, वैसा साफ-सुथरा बेदाग नहीं पाया, जैसा वह था.

धीरे-धीरे वह कपड़ा जहाँ दाग गहरा लगा होता है वह कपड़ा गलने और फटने लगता है.

इसी तरह यह शरीर रूप में वस्त्र (के) जिस हिस्से पर भी दोषों का दाग लगा हुआ था, वह हिस्सा गलने और फटने लगा.

जिस हिस्से में रोग होते हैं, वे हिस्से रोगी अकारण ही नहीं होते. उनके पीछे तुम्हारे अपने ही वे कारण होते हैं, जो उन्हें रोगी बना देते हैं.

निर्जीव सी दिखती दीवारें तो आपस में नहीं टकरातीं. मगर उन दीवारों के अन्दर रहने वाले ही, उन बनी हुई दीवारों को बार-बार तोड़ कर नई दीवारों का घर, और छत को तोड़कर, नई छत बनाने के यत्न में लगे रहते हैं.

तभी आज कोई जानता ही नहीं कि धर्म क्या है, क्योंकि धर्म का रूप जैसा स्वार्थी और पांखडी लोग बताते रहे हैं, वही तुम्हें धर्म लग रहा था, और उसी की धर्म की छत डालकर, अपना परिवार बनाना चाहा, तो वह छत धर्म की न होने से, अधर्म की होने के कारण, कर्मकण्डों की भित्तियों पर टिका होने से, टूटने और गिरने लगी. जो उनमें परिवारों के रूप में रह रहे थे, वे ही उनके नीचे दबने लगे.

अगर जीवन में सुख और प्रेम चाहते हो, तो इन्हीं को पाने के लिये, इन्हीं की खेती करो. खेती भी (उन) सभी को करनी होगी, जो भी सुख और प्रेम का अन्न खाना चाहते हैं.

यह खेती एक का ही धर्म नहीं है. परस्पर खेती करोगे, तो वह तभी संभव होगा कि जब सभी का विश्वास सत्य होगा, जब सभी सत्य के साधन से वह खेती करना जानते होंगे.






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