सत्य का सागर है यह मेरी वाणी : भगवान

(११ दिसंबर, १९९४)
सत्य का सागर है यह मेरी वाणी, जहाँ जो भी इसके जल का पान करेगा, वह निश्चित रूप से ही शक्ति भी पायेगा, शान्ति भी।
किंतु यह जल उस तरह का है, जिसका रस पीने की आकांक्षा और लोभ ही जिसका होगा, वही इसे पीना भी चाहेगा, क्योंकि यह जल ही ऐसा है, जो जिस भाव से पियेगा, उस पर उसी रूप में यह प्रभाव डालने वाला भी होगा।
क्योंकि मनुष्य का शरीर, जैसा मैं तुम्हें बताता ही रहा हूँ कि इसमें जब तक सत्य नहीं होगा, जल का प्रभाव और रूप भी उस पर न तो सत्य के प्रभाव जैसा होगा, न ही वह अन्दर जाने के पश्चात् अपने वैसे ही सत्य रूप में, साफ-सुथरा दिखाई देगा।
जिस तरह जल तो स्वयं में साफ-सुथरा ही होता है, मगर यह उस भूमि पर निर्भर करता है, जैसी भूमि पर गिरता और जमा होता है। भूमि गंदी होती है, तो यह गंदा और कीचड़ जैसा भी हो ही जाता है।
मगर भूमि यदि साफ होती है, तो देखा ही है कि गंगा की धार किस तरह जहाँ से आती है वह साफ और स्वच्छ होती है; क्योंकि पहाड़ को पहाड़ तो अवश्य कहते हो तुम, मगर उनमें गंदगी नहीं होती। वे भी स्वच्छ ही होते हैं और उन पर निरन्तर ही वह गंगाजल गिरता रहा है और गिरता रहेगा।
उसी तरह हर ओर जहाँ भी झरनों और नदियों के आगम-स्थान हैं, आज भी (उन) जगहों पर जाकर देखोगे तो तुम्हें, जल इतना अधिक साफ-सुथरा और शुद्ध मिलेगा, जैसा जल अन्यत्र तुम्हें कहीं प्राप्त हो ही नहीं सकता है।
मन में तुम्हारे इतना प्रदूषण भरा हुआ है कि भक्ति में भी प्रदूषण ही मिल जाता है।
तब भक्ति के द्वारा जो शक्ति और शान्ति मिलनी चाहिये, वह तुम्हें मिल भी नहीं पाती है।
फिर कहते हो कि कभी मन नहीं लगता, कभी शरीर में कोई रोग तुम्हारी भक्ति में बाधा है, कभी शरीर की अस्वस्थता के कारण तुम्हारे द्वारा कोई भी कर्म मेरे लिये नहीं हो पाता।
पृष्ठ 60-62 दिव्य ज्योति (भगवान की वाणी) से साभार लिया गया
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