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मैं तो तुम्हारे मन पर दृष्टि रखे हूँ : भगवान की वाणी

आत्म-निरीक्षण और सुरक्षा का मार्ग

मैं तो तुम्हारे मन पर दृष्टि रखे हूँ : समय पर दृष्टि बनाए रखो, सब कुछ स्वयं दिखाई दे जायेगा। मगर स्वयं पर भी दृष्टि रखो कि किस तरह तुम मेरे लिये क्या करते हो? क्योंकि मैं तो तुम्हारे मन पर दृष्टि रखे हूँ। जो करोगे वह तुम्हारे लिये ही हित में होगा; क्योंकि यही तो वह स्थान होगा जहाँ अनेकों सुरक्षा पायेंगे।

पानी की स्थितियाँ जो दिन-प्रतिदिन प्यास लेकर आयेंगी इनके लिए भी तो तुम्हें स्थान बनाना ही होगा। सत्य तो स्वयं ही देखोगे कि इन स्थितियों के बीच भी क्या किसी सत्य का तुम्हें दर्शन होता है? स्थिति का नाम एक ही होता है, वह चाहे जितने भी रूपों में बँटी हो। मगर सारी स्थितियाँ मिलकर भी जब एक ही स्थिति का रूप होती हैं, तब वह जल-समस्या के रूप में, एक ही समस्या का रूप बनेगी। मगर यह स्थिति किस तरह सत्य का दर्शन देती है, यह किस तरह मनुष्यों का विश्वास और जीवन, प्रेरणा से बँध कर मुझे स्वीकार करता है, देखना।

प्यास और जल-समस्या का समाधान मेरी पहचान देगा।

मनुष्य का भटकाव और स्वार्थ

मनुष्य के स्वार्थ के कारण ही भयंकर नरसंहार हो रहा है।

मनुष्य अपने कई रूपों में जब संसार में जीता है तब वह धीरे-धीरे अपना वास्तविक रूप स्वयं भूल जाता है, यह उसका सबसे गिरा हुआ रूप होता है। वह नहीं भी करते थे; या फिर सोचते हो कि कब यह पाठ खत्म होगा और कब तुम्हें अपना समय अपने कामों में लगाने का अवसर मिलेगा?

  • गीता’ भी समझना मुश्किल हो तो आज धर्म को मेरे द्वारा दिये ज्ञान, मेरी वाणी में ही जानो. सबसे सीधा और सरल रास्ता है धर्म का : भगवान
    अध्याय – १९ सम्बन्धों का अर्थ है, सत्य, प्रेम, विश्वास व त्याग की नींव पर बनी दीवारों को पकड़े, धर्म की छत से (१९ अक्टूबर, १९९४) मनुष्यों में सम्बन्ध इसलिये बनाये गये थे कि जिसके द्वारा मनुष्य अपनी मर्यादा में रह सके. यह भी सत्य है कि जो संबंध, जिन्हें तुम्हारे संसार में सम्बन्ध कहा जाता है, वे मेरे बनाये नहीं हैं. मगर इनको जिन्होंने भी आरम्भ में बनाया वे थे आरम्भ में जिन्होंने धरती पर मनुष्यों को किस तरह रहना चाहिये, किस धर्म का पालन करना चाहिये, समाज याRead More
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    मेरे रूपों की गणना कोई भी नहीं कर सकता है। अध्याय – १४ : तुम्हारी वाणी में मेरा वास है (१४ अक्टूबर, १९९४) तुम्हारे जीवन के हर पग पर, अपने साथ, अपनी शक्ति, संबल और जीवन की हर बाधा को समाप्त करके सुखी, शान्त और यशस्वी दृढ़ जीवन का ही आशीर्वाद देता हूँ। जीवन में कहीं भी, एक भी लिया हुआ तुम्हारा निर्णय, कभी अधूरा या अपूर्ण और व्यर्थ नहीं होगा। तुम्हारी वाणी में तो मेरा ही वास है तुम्हारी वाणी में तो मेरा ही वास है, फिर किसी भीRead More
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    (११ दिसंबर, १९९४)सत्य का सागर है यह मेरी वाणी, जहाँ जो भी इसके जल का पान करेगा, वह निश्चित रूप से ही शक्ति भी पायेगा, शान्ति भी। किंतु यह जल उस तरह का है, जिसका रस पीने की आकांक्षा और लोभ ही जिसका होगा, वही इसे पीना भी चाहेगा, क्योंकि यह जल ही ऐसा है, जो जिस भाव से पियेगा, उस पर उसी रूप में यह प्रभाव डालने वाला भी होगा। क्योंकि मनुष्य का शरीर, जैसा मैं तुम्हें बताता ही रहा हूँ कि इसमें जब तक सत्य नहीं होगा, जलRead More
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निष्काम भाव और व्यय की सार्थकता

मेरे लिये व्यय करने में संकीर्णता दुर्भाव ले आती है।

इसी तरह जब कभी कुछ भी व्यय हो जाता है तुम्हारे मेरे लिये, तो वास्तव में तुम्हारे अन्दर भक्ति की धर्म बुद्धि होती तो उस बिन्दु में कभी सोचोगे भी नहीं कि कितना तुमने रोगी प्राणी में अर्पित करने दिया, कितना तुमने मुझे किस भाग में दे दिया, यही ज़्यादा व्यय हो गया, और इस तरह जब सोचोगे, तो वह व्यय भी तुम्हारा सार्थक होते हुए, भी निरर्थक हो जाता है। यही संकीर्णता तो तुम्हारा दुर्भाव ले आने का समय मेरे लिए बीत जाता है तो समय दिया हुआ और बेकार बीता हुआ लगता है। धन व्यय हो जाता है तो धन बेकार बीता हुआ और बहुत अधिक व्यय हो जाता हुआ लगता है। जीवन में जो भी मेरे लिए बीत जाता है, वह कष्ट देने लगता है, या फिर कहीं विकृती भाव में कभी मानवता के नाम पर कुछ व्यय हो गया तब भी किसों न किसी क्षण वह दुख का भाव या फिर कुछ व्यय हो जाने का भाव दे ही जाता है।

परोपकार और सौभाग्य का अर्जन

अन्यों के लिये बीता जीवन सौभाग्य का अर्जन करता है।

इसके अतिरिक्त हमेशा ही स्वयं को बहुत बड़ा पुण्यआत्मा और भाग्यवान मानकर अहंकारी बने रहते हो। यह भी तुम्हारे अपने भाव ही होते हैं। क्या तुम्हारा अपना जीवन अपने लिए ही बहुत श्रेष्ठ होता है या अन्यों के लिए भी?

जब जीवन अन्यों के लिए बीतता है तब वह सौभाग्य का अर्जन करता है। जब जीवन केवल अपने लिए ही बीतता रहता है तब अधिकतर प्रत्यक्ष में तो लगता है कि बहुत कुछ पाया, बहुत कुछ अर्जित किया। इस रूप में तो तुम्हारा अधिकार भी बढ़े, तुम्हारा सम्मान भी, ध्यान-परिवार भी, समर्थ भी और शक्तिशालों भी हुआ। मगर इसमें से गिरा क्या है जो तुम्हारे लिए सौभाग्य वास्तव में लेकर आया हो? उन पलों को तुमने अपने धन-पद, ऐश्वर्य और अपना अहंकार संचय करने में लगा दिया। उन पलों में तुमने बहुत कुछ खोना और पाना मुझे…

सांसारिक आकर्षण और आत्म-समर्पण

लगता भी नहीं। इसीलिए तो मुझे खोने में डर लगता है। मुझे खोकर उन क्षणों में जिन क्षणों में अपने-आप को पाते हो या फिर अपनी इच्छाओं को पूरा करते हुए कभी अपनों की, कभी भोगों की, कभी अपने स्वाद-वृत्ति की संतुष्टि को पाते भी हो, वही तुम मुझे वास्तव में खोना होता है, किन्तु तुम्हारी दृष्टि में पाना होता है।

तुम्हारे जीवन की सार्थकता, केवल स्वयं को मुझसे हटाकर, मुझसे (मुझको) पाने का प्रयत्न करने पर होगी। अपने भावों को अधिक से अधिक (मुझसे) जोड़ देने में है। जब तुम्हारा ‘स्व’ मुझे पाने के भाव में घूमता रहेगा, तब तुम्हें सारा जगत् केवल पाने का स्थान जैसा नहीं लगेगा, तुम्हें यह जगत् मुझे पाने का स्थान और मेरे रूप जैसा लगेगा।

शरीर और संसार का सत्य रूप

यह जगत् भी मेरे पाने का स्थान बन सकता है। तुम्हारा यह शरीर भी मुझे पाने का साधन बन सकता है, जब इस शरीर से मुझे इस जगत् में ही पाने का प्रयत्न करते रहोगे, जब मन की दृष्टि एकटक, केवल मेरी ओर लगाये रखोगे, जीवन का यह रूप ही बदल जायेगा। सत्य भी यही है।

यह शरीर असत्य होते हुए भी सत्य ही बन जायेगा, जब इस शरीर का प्रयोग सत्य रूप में सत्य की प्राप्ति के लिए, सत्य के ही भाव को धारण किये रहकर करोगे।






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