व्यंग्य : लोकतंत्र का ट्रैफिक जाम

कहते हैं लोकतंत्र में जनता मालिक होती है। लेकिन कभी-कभी मालिक को अपने ही घर जाने के लिए पुलिस से अनुमति लेनी पड़ जाती है।
दिल्ली में प्रदर्शन होना था। सरकार ने सोचा कि प्रदर्शन सफल न हो, इसलिए प्रदर्शनकारियों को रोकना काफी नहीं होगा—पूरे शहर को ही रोक दिया जाए। सड़कें बंद, बैरिकेड खुले, मेट्रो बंद, रास्ते बंद और जनता खुली… बस ट्रैफिक में फँसी हुई।
लगता है प्रशासन ने नया गणित खोज लिया है—”यदि लोग प्रदर्शन स्थल तक नहीं पहुँचेंगे, तो प्रदर्शन हुआ ही नहीं माना जाएगा।”
अब अगली बार बारिश आए तो बादलों को भी धारा 144 का नोटिस भेज देना चाहिए। कहीं वे बिना अनुमति बरस न पड़ें।
व्यंग्य की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि प्रदर्शन रोकने की कोशिश में लाखों ऐसे लोग परेशान हो जाते हैं जिनका आंदोलन से कोई संबंध ही नहीं होता।
दफ्तर जाने वाला कर्मचारी, परीक्षा देने वाला छात्र, अस्पताल जाने वाला मरीज और घर लौटने की जल्दी में खड़ा आम नागरिक—सब अचानक “राष्ट्रीय सुरक्षा योजना” का हिस्सा बन जाते हैं।
सरकार कहती है कि सुरक्षा सर्वोपरि है। यह सही भी है। लेकिन लोकतंत्र में संवाद भी उतना ही सर्वोपरि होना चाहिए।
यदि हर असहमति का उत्तर बैरिकेड होगा, तो एक दिन बैरिकेड इतने बढ़ जाएंगे कि सरकार और जनता के बीच की दूरी भी स्थायी हो जाएगी।
शायद लोकतंत्र का सबसे सस्ता और सबसे प्रभावी हथियार पुलिस नहीं, बातचीत है। बातचीत में न बैरिकेड लगते हैं, न ट्रैफिक जाम होता है और न ही शहर को बंद करना पड़ता है।
लोकतंत्र में विरोध कोई वायरस नहीं है जिसे कंटेनमेंट ज़ोन बनाकर रोका जाए। विरोध कभी-कभी सरकार के लिए आईना भी होता है। फर्क सिर्फ इतना है कि आईना देखने की हिम्मत होनी चाहिए।
और अंत में…
दिल्ली वालों को बधाई! वे उस ऐतिहासिक दिन के गवाह बने जब प्रदर्शन कुछ घंटे चला, लेकिन ट्रैफिक ने पूरे दिन अपना धरना जारी रखा।
(यह लेख व्यंग्य है। इसका उद्देश्य लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और सार्वजनिक नीतियों पर हास्य एवं टिप्पणी प्रस्तुत करना है।)


