Main Menu

कश्मीरी पंडितों का 1990 विस्थापन: क्या हुआ था, किसकी क्या भूमिका थी और 2014 के बाद कितना न्याय हुआ?

kashmiri_pandit_rumour_vs_facts

कश्मीरी पंडितों का 1990 विस्थापन: क्या हुआ था, किसकी क्या भूमिका थी और 2014 के बाद कितना न्याय हुआ?

1987 के चुनाव से 2026 की जांच तक की पूरी कहानी | Rumour vs Facts

लेकिन इस त्रासदी पर आज भी राजनीतिक बहस जारी है—

Kashmiri Pandit Rumours Vs Facts (1)

भारत सरकार ने 17 मार्च 2021 को राज्यसभा में बताया कि :
1990 से सुरक्षा कारणों से घाटी छोड़ने वाले 44,167 Kashmiri migrant families registered थीं।
इनमें 39,782 Hindu migrant families थीं।

सरकारी आंकड़ा registered families का है; इसे कुल वास्तविक विस्थापित व्यक्तियों की संख्या के बराबर नहीं माना जाना चाहिए।

कांग्रेस की भूमिका क्या थी?

यहां इतिहास को दो अलग-अलग कालखंडों में देखना होगा।
1980 के दशक मेंकांग्रेस केंद्र में सत्ता में थी।
राजीव गांधी सरकार और फारूक अब्दुल्ला के बीच समझौते के बाद Congress-National Conference alliance बना।
1987 का विधानसभा चुनाव इसी गठबंधन ने मिलकर लड़ा।

चुनाव में धांधली के आरोपों के बाद कश्मीर में राजनीतिक असंतोष बढ़ा।

क्या फारूक अब्दुल्ला जिम्मेदार थे?

फारूक अब्दुल्ला की राजनीतिक भूमिका पर सवाल उठाए जा सकते हैं, विशेषकर 1987 के चुनाव और उससे पहले की राज्य राजनीति के संदर्भ में।

लेकिन एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि 19 जनवरी 1990 के बाद वे मुख्यमंत्री नहीं थे।

उनके इस्तीफे के बाद राज्य प्रत्यक्ष केंद्रीय शासन के अधीन चला गया।
इसलिए “फारूक अब्दुल्ला 1990 के पूरे विस्थापन के मुख्यमंत्री थे”—यह दावा गलत है।

जगमोहन के बाद क्या हुआ?

जगमोहन का 1990 का दूसरा कार्यकाल कुछ ही महीनों का रहा।
26 मई 1990 को गिरीश चंद्र सक्सेना ने राज्यपाल का पद संभाला।
आधिकारिक लोक भवन रिकॉर्ड इसकी पुष्टि करता है।

जगमोहन बाद में सक्रिय राजनीति में आए।
1996 में वे नई दिल्ली से BJP लोकसभा सांसद चुने गए और 1998 में फिर सांसद बने।

बाद में उन्होंने केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में केंद्रीय मंत्री के रूप में काम किया।

क्या 2014 से पहले पंडितों के लिए कुछ नहीं हुआ? : यह दावा भी सही नहीं है।

केंद्र सरकार ने 2008 और बाद में 2015 में कश्मीरी विस्थापितों (migrants) की वापसी और पुनर्वास (rehabilitation) के लिए योजनाएं बनाईं।

इसमें:- रोजगार- आवास- cash assistance- rehabilitation- transit accommodationजैसे प्रावधान शामिल थे।

2014 के बाद क्या बदला?

2014 के बाद केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में BJP सरकार आई।

कश्मीरी migrants की rehabilitation को लेकर PM packages के तहत रोजगार और आवास की योजनाएं आगे बढ़ीं।

2022 में केंद्र सरकार ने लोकसभा में बताया कि PM Development Package के तहत 5,502 Kashmiri migrants को सरकारी नौकरियां दी जा चुकी थीं और 6,000 transit accommodations के निर्माण को मंजूरी दी गई थी।

सरकार ने security grid, patrolling, intelligence और अन्य सुरक्षा उपायों की भी जानकारी दी।—

5 अगस्त 2019 के बाद जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक स्थिति में बड़ा बदलाव हुआ, लेकिन इससे अपने आप सभी विस्थापित परिवारों की घाटी में वापसी नहीं हुई।

2021 के सरकारी आंकड़े भी बताते हैं कि rehabilitation और return की प्रक्रिया जारी थी।

अर्थात:Article 370 में बदलाव = संवैधानिक परिवर्तन

लेकिनArticle 370 में बदलाव = सभी पंडितों की घर वापसीकहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है।

क्या 2014 के बाद भी कश्मीरी पंडितों पर हमले हुए?

हाँ।

2019 के बाद भी targeted killings और सुरक्षा संबंधी घटनाएं हुईं।

इसी पृष्ठभूमि में सरकार ने कश्मीरी पंडित कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए security grid, area domination, patrolling और अन्य उपायों की जानकारी संसद में दी।

इससे स्पष्ट है कि 2014 के बाद भी सुरक्षा चुनौती पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी।

2026: क्या पुराने मामलों में फिर से जांच शुरू हुई?

यह वर्तमान समय का महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। जून 2026 में जम्मू-कश्मीर State Investigation Agency ने 1990 की कश्मीरी पंडित नर्स सरला भट की हत्या के मामले में chargesheet दाखिल की।इसमें JKLF के तत्कालीन प्रमुख यासीन मलिक सहित पांच आरोपियों के नाम शामिल किए गए।

मामले में SIA की chargesheet के दावों को अदालत में अंतिम दोषसिद्धि के बराबर नहीं माना जा सकता।

यासीन मलिक ने बाद में अपनी संलिप्तता से इनकार किया।

इसी वर्ष SIA ने 1998 के वंधामा नरसंहार, जिसमें 23 कश्मीरी हिंदुओं की हत्या हुई थी, की जांच भी फिर शुरू की।

कश्मीरी पंडितों की त्रासदी को राजनीतिक बहस में इस्तेमाल करने से पहले एक बात स्पष्ट होनी चाहिए—पीड़ितों की पीड़ा को स्वीकार करने के लिए आंकड़ों को बढ़ाने या इतिहास को किसी एक पार्टी अथवा व्यक्ति तक सीमित करने की आवश्यकता नहीं है।

उग्रवादी हिंसा, लक्षित हत्याएं और धमकियां इसके महत्वपूर्ण कारणों में थीं। साथ ही 1987 की चुनावी राजनीति, केंद्र-राज्य संबंध, प्रशासनिक विफलता और सुरक्षा व्यवस्था की विफलताओं ने भी परिस्थितियों को प्रभावित किया।इसलिए इतिहास का सवाल केवल यह नहीं है कि

“किसकी सरकार थी?”

बड़ा सवाल यह भी है:“ऐसी स्थिति क्यों पैदा हुई जिसमें एक समुदाय अपने घर छोड़ने को मजबूर हुआ, और तीन दशक से अधिक समय बाद भी उसकी पूर्ण वापसी और न्याय का सवाल क्यों बाकी है?”

यही वह सवाल है जिस पर राजनीति से आगे बढ़कर तथ्य, दस्तावेज और जवाबदेही के आधार पर बहस होनी चाहिए।

तेज प्रकाश, संपादक, Hotlink News






Related News

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *