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संबंधों के नाम पर अपनी चिता कब तक जलाते रहोगे?

sambandho ke naam par kab tak apni chita jalate rahoge

अध्याय – २५ : संबंधों के नाम पर अपनी चिता कब तक जलाते रहोगे?

२३ मई १९९४

सत्य मनुष्य की शक्ति भी है, शान्ति भी।

यह मनुष्य का अपना ही अविश्वास और असत्य से जुड़ा मन होता है, जिसके कारण वह जीवन भर अशक्त भी रहता है, अशान्त भी।

हरेक, जो भी भक्ति करता है वह अपनी भक्ति का आधार जिसे भी बनाता है अथवा उस आधार पर ही, अपने आपको उसका भक्त भी कहता है, मगर यदि पूछा जाये कि उसकी भक्ति का कारण क्या है, (तो) वह यह शायद ही कभी कह सके कि भक्ति का आधार भी वास्तव में उसकी अपनी भक्ति-भावना है, ऐसी भक्ति-भावना जो भगवान के दर्शन की कामना का रूप होती है।

भक्ति में जब तक भावना न हो केवल कुछ परंपरागत सिद्धान्त हों; और इन्हीं सिद्धान्तों को पूरा करके, अगर वह मान ले कि वह मेरा भक्त है, तो क्या वास्तव में भी वह मुझे भक्त के रूप में स्वीकार होगा?

यहाँ पर फिर से मैं यही बताता हूँ, कि मुझे तुम्हारे परंपरागत सिद्धान्तों के आधार पर तुम्हारी पूजा की आवश्यकता नहीं होती।

मैं तो केवल भावना से जुड़े उस विश्वास के आधार पर समर्पित जीवन को ही स्वीकार करता हूँ, जो मुझे मेरे हर रूप में, हर स्थान पर पहचान कर, स्वीकार करने के लिये स्वीकार नहीं करता, आनंद के साथ, मेरे दर्शन की अनुभूति के आनंद से भरा मन लेकर रहता है।

जब भी कहीं पर, किसी भी कारण से, मन की स्थिति अस्थिर होती है, फिर वह भक्ति कैसी? अपनी इच्छाओं, अपने संबंधों, अपनी वासनाओं की भक्ति करने वाला ही तो अपने मन का सुख और आनंद, उन्हीं के लिये, उन्हीं के सुख और आनंद की अनुभूति के हाथों बेच देता है, और मात्र यही कारण होता है, उसके हर क्षण दुःखी और चिंतित रहने का।

अगर वास्तव में तुमने मेरी वाणी को पढ़ा और मन में ग्रहण किया होता, तो आज का तुम्हारा जीवन इस तरह से अपनों के ही बिछाये काँटों पर पड़ा, छटपटाता नहीं होता।

संबंध तभी तक संबंध होते हैं, जब तक उनमें संबंध होने का आभास ही न हो।

संबंधों के नाम पर अपनी चिता कब तक जलाते रहोगे? : उन संबंधों के नाम पर अपनी चिता कब तक जलाते रहोगे? सारा संसार या तो अपनी विषय-वासनाओं और संबंधों के पीछे भागता रहा है, या फिर वह केवल सारा जीवन अपने ही पीछे भागते बिता देता है। कभी वह अपनी विषय-वासनाओं में डूब कर, सत्य और धर्म से दूर रह जाता है, और इतना डूब जाता है कि वह उस विषय-वासनाओं के सागर में डूबा जो कर्म कर रहा है, जिस तरह का जीवन जी रहा है, वह अगर सत्य और धर्म भूल चुका है, तो कहीं असत्य और अधर्म को ही तो अपना जीवन मान कर नहीं बैठा है? जो भी जिस समय, जिस क्षण भी सत्य और धर्म की ओर से हटा दूसरी ओर लगा रहता है, वे क्षण ही उसके जीवन के, मात्र असत्य के संचय के खाते में जमा और उसके अपने जीवन में से व्यय हो जाते हैं।

असत्य में डूबता, अपने-पराये के भाव से ग्रस्त मनुष्य हर कुछ में, अपना ही प्रतिबिम्ब प्रतिबिम्बित होता हुआ पाना चाहता है।

उसी तरह “जो केवल अपने या पराये के विषय में डूबा हुआ, या तो उन्हीं के प्यार में या उन्हीं की कृपा, ईर्ष्या या क्रोध होने के भाव में डूबा, मन, वचन और कर्मों में असत्य बसा कर रखता है वह भी उन पलों में, मुझसे दूर रह कर, इतना दूर रह जाता है कि मुझसे कुछ भी नहीं पाता। जो पाता है वह भी उसके भाग्य के खाते में केवल असत्य और अधर्म का संचय ही बन जाता है; और जो स्वयं, अपने ही जीवन के पीछे भागता रहता है, वह हर क्षण, हर कुछ में, अपने को ही देखता, अपने लिये ही सोचता, अपने लिये ही कर्म करता हुआ, संसार के हर कुछ में, अपना ही प्रतिबिम्ब, प्रतिबिम्बित होता हुआ पाना चाहता है।

फिर संसार का हर कुछ उसे अपना अधिकार-क्षेत्र जैसा अगर लगता भी है, तब क्या उसकी इच्छा मात्र होने से उसका हो जाता है? ऐसा व्यक्ति, जब भी जो भी उसे प्राप्ति की इच्छा होती है और नहीं प्राप्त होने से क्रोधित हो जाता है; या फिर जब वह मुझसे भी कुछ पाना चाहता है, उसी आधार पर मुझे पहचानता और भक्ति करता कुछ पाना चाहता रहता है; मात्र स्वार्थ और स्वयं अपना जीवन ही, उसके जीवन के हर भाग में प्रथम भाग के रूप में रहता है। किसी भी कर्म का कर्ता वह किसी दूसरे के लिये नहीं होता। मात्र अपने लिये ही होता है। मात्र अपने लिये जीने वाला, मुझसे क्या प्राप्त कर सकता है? ऐसे ही जीवन वे होते हैं, जो अपनी इच्छा-प्राप्ति के लिये हर

अच्छे-बुरे कर्म करते हैं, उन्हें इस कर्म से जब तक अपना लाभ दिखाई देता है, तब तक ही वे कर्म करते हैं। अपना ही लाभ दिखाई देता है, तब तक ही वे, संबंध भी रखते हैं। अपना ही भाव जब संतुष्ट होता है तब तक वे किसी को अपना या पराया मान कर, उस ओर उन्मुख होते हैं। ऐसे लोग भौतिक दृष्टि से कुछ भी पा सकते हैं, किन्तु उनके जीवन में कभी पुण्यों का संचय नहीं हो पाता, और वे पुण्यों की ओर तो कभी भागते ही नहीं। तभी तो कोई भी कर्म, किसी पुण्य का संचय करने के लिये करते भी नहीं, और जीवन चाहे मनुष्य का पाये भी होते हैं, मगर वह जीवन पूर्ण रूप से ही अर्थहीन होता है। वह जीवन केवल खोता ही रहता है। उसे खोने के रूप में तो वह खोता ही जाता है, अपनी आयु, अपना समय और अपने जीवन की शक्ति भी, क्योंकि भोग-विलासविलास शरीर की शक्ति बढ़ाते नहीं घटाते हैं।

भोग-विलासविलास अति की सीमा तक पाने की जब कामना होती है, तब उसके लिये सोच-समझ, विचार-बुद्धि, धर्म-अधर्म की सारी भावनायें खो बैठते हैं, और इन कारणों से उनका जीवन धीरे-धीरे अधर्म की ओर बढ़ता जाता है। असत्य तो उनके जीवन का मूल-मन्त्र ही होता है, जिस पर वे अपना संपूर्ण जीवन ही टिका कर रखते हैं।

शरीर में, आत्मा में बसी सत्य की शक्ति, शरीर की शक्ति, नेत्रों की ज्योति, मन-मस्तिष्क की शक्ति बन जाती है।

सत्य से जितना दूर रहोगे, सत्य उतना ही दूर हो जायेगा। फिर जब सत्य दूर ही हो जायेगा तो आत्मा में बसी सत्य की शक्ति, तुम्हारे शरीर की शक्ति, तुम्हारे नेत्रों की ज्योति, तुम्हारे मन-मस्तिष्क की शक्ति, कहाँ बन पायेगी, वह तो क्षीण से क्षीणतर ही होती चली जायेगी। धीरे-धीरे आज का मनुष्य क्षीण से क्षीणतर शारीरिक शक्ति वाला भी तो इसीलिए होता जा रहा है। दृष्टि की क्षमता भी घटती ही जा रही है, क्योंकि आत्मा की ओर तो वह दृष्टि भी नहीं डालता। फिर परमात्मा तो उसके जीवन में केवल सुना-सुनाया नाम भर होता है। उसका कोई भी अस्तित्व उसके जीवन में ठहरा हुआ नहीं होता।

जब जिसके अस्तित्व का भी आभास न हो, फिर किसी भी रूप में, किसी भी नाम या आकार की पूजा क्यों न करते हो, उस नाम, रूप या आकार से प्राप्त ही क्या होगा?

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