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भयंकर रूप से, चारों ओर से आने वाली विपत्तियों का समय है

nastik bhi pahchanenge (1)

भगवान की वाणी के दिव्य ज्योति वाणी खंड के अध्याय 20 पृष्ठ 176 से 179 से साभार लिया गया है!
प्राप्ति स्थान : सिद्ध शक्तिपीठ सत्य मंदिर, बी 116/2 इंदिरा नगर लखनऊ

१८ मई १९९४

नास्तिक को भी मेरी पहचान की बुद्धि आ जायेगी। पशु-वध का खुला रूप कम होगा।

चारों ओर से आने वाली विपत्तियों का समय है : संसार में हर ओर भयंकर रूप से चारों ओर से विपत्तियां आने वाली हैं। यह भी सत्य है इनका कारण तो, मात्र मेरा क्रोध ही है। यह सब जो कहोगे कि संसार में यह तो होता ही रहता है, यह मत सोचना, क्योंकि जो होता रहता है; और अब होगा इन सबके बीच महत्वपूर्ण परिवर्तन यह भी होगा, कि मनुष्य जो आज तक, स्वतंत्र रूप से स्वतंत्राचरण करता हुआ, चारों ओर अपनी पाशविकता फैलाता गया, स्वयं को ही बढावा दे रहा था, वह हर हालत में समझेगा कि उसके अपने ऊपर भी कोई शक्ति ऐसी है, जो उसके कर्मों का हिसाब करने, संसार में आ पहुँची है। यह सत्य इतना स्पष्ट होगा कि हर नास्तिक को बुद्धि आ जायेगी। पशु-वध का खुला रूप धीरे-धीरे कम होगा।

मनुष्य अब अपनी रक्षा के लिये मेरे द्वार पर भाग कर आयेगा, धर्म के लिये नहीं।

जो आज तक भयंकर रूप से आसुरी रूप धारण किये हुये थे, आगे जीवन पर आते संकट, स्वयं उन्हें सतर्क कर देंगें, क्योंकि संसार में चारों ओर जितनी तेज़ी से मेरी वाणी अपना रूप प्रकाशत करती जा रही है, अंधों को भी दिखाई देने लगेगा, क्योंकि जब मनुष्य के स्वयं के ऊपर संकट आता है तब वह स्वयं अपने बचाव की शक्ति तलाशता घूमता है। जब तक वह अन्यों को अपने आसुरी रूप का शिकार बना कर अपनी इच्छा-पूर्ति करता रहता है उसे किसी अन्य के कष्ट का तो आभास भी नहीं होता। मगर जब (संकट) स्वयं अपने ऊपर विपत्ति बन कर आ खड़ा होता है, (तब) मनुष्य धर्म के लिये नहीं, स्वयं अपनी रक्षा के लिये मेरे द्वार पर भाग कर आयेगा। चारों ओर प्रलय के बादल, अनेकों रूप ले कर आ रहे हैं। इन्हें नाम कोई भी दो, किंतु इनका अपना वास्तविक और पूर्ण रूप तो प्रलय का ही है। समय के साथ-साथ, संसार में चारों ओर परिवर्तन होगा। मगर यह भी सत्य है कि मात्र मुझे पहचानने या मेरी ओर

भागने से ही क्या सभी बच पायेंगे?

यहाँ पर ऐसा कुछ नहीं है कि वे मुझ तक आ भी जायें या फिर जो आ चुके हैं, या पहले से ही बैठे हैं, इतने भाग्यशाली हैं कि वे भी मेरे न्याय-रूप से बचेंगे। जैसा मैं पहले भी तुम्हें बता रहा था कि मेरी भक्ति में अपने स्वाथों का अर्पण करते हुये, भक्ति कर लेने से सभी भक्त, नहीं हो जाते हैं, न ही मैं उनके उन रूपों से छला जाता हूँ।

भक्ति में स्वार्थ नहीं त्याग ही मुख्य है।

मनुष्य की भक्ति में तो त्याग ही मुख्य है।

‘सत्य-तीर्थ’ के निर्माण की स्थिति तुम्हारी परीक्षा की भी स्थिति है।

अब तो समय आया है परीक्षा का भी जब स्थिति मेरे ‘सत्य-तीर्थ’ के निर्माण की भी आ ही चुकी है। देखना है, अब तुम्हारी भावना यहाँ किस तरह की आती है और इस ओर कितना, किस रूप में, क्या त्याग कर पाते हो? यहाँ भी समझ लो कि यहाँ जो भी होगा, वह होगा मेरी इच्छा से। किस तरह, कौन सी स्थितियाँ आ कर इसका अंत देंगी, यही समय पर दृष्टि रखो, सब कुछ स्वयं दिखाई दे जायेगा।

मगर स्वयं पर भी दृष्टि रखो कि किस तरह तुम मेरे लिये क्या करते हो? क्योंकि मैं तो तुम्हारे मन पर दृष्टि रखे हूँ। जो करोगे वह तुम्हारे लिये ही हित में होगा; क्योंकि यही तो वह स्थान होगा जहाँ अनेकों सुरक्षा पायेंगे।

पानी की स्थितियाँ जो दिन-प्रतिदिन प्यास लेकर आयेंगी इनके लिए भी तो तुम्हें स्थान बनाना ही होगा। सत्य तो स्वयं ही देखोगे कि इन स्थितियों के बीच भी क्या किसी सत्य का तुम्हें दर्शन होता है? स्थिति का नाम एक ही होता है, वह चाहे जितने भी रूपों में बंटी हो। मगर सारी स्थितियाँ मिलकर भी जब एक ही स्थिति का रूप होती हैं, तब वह जल-समस्या के रूप में, एक ही समस्या का रूप बनेगी। मगर यह स्थिति किरा तरह सत्य का दर्शन देती है, यह किस तरह मनुष्य का विश्वास और जीवन, प्रेरणा से बंध कर मुझे स्वीकार करता है, देखना।

प्यास और जल-समस्या का समाधान मेरी पहचान देगा।

मनुष्य के स्वार्थ के कारण ही भयंकर नरसंहार हो रहा है। मनुष्य अपने कई रूपों में जब संसार में जीता है तब वह धीरे-धीरे अपना वास्तविक रूप स्वयं भूल जाता है, यह उसका सबसे गिरा हुआ रूप होता है।

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