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क्या गांधी जी ने अंग्रेजों से ₹100 पेंशन लेते थे?

महात्मा गांधी की हत्या तो सिरफिरों ने कर दी पर उनकी विशालकाय छवि को छू भी नहीं पाए!

जब जब गांधी पर थूका इनका ही मुँह थूक से सन गया!

पिछले कुछ समय से एक नया और बेहद ख़तरनाक झूठ महात्मा गांधी के बारे में फैलाया जा रहा है। संभव है, संघी गिरोह का कोई सदस्य आपके सामने भी यह झूठ परोस चुका हो या आगे किसी दिन परोस दे। इसलिए यह तथ्य आपके संज्ञान में हो, यह जरूरी है।

राष्ट्रीय संग्रहालय के उस दस्तावेज को व्हाट्सएप पर ठेला जा रहा है जिसमें दर्ज है कि बापू को अंग्रेज़ सरकार ने 1930 में नागरिक अवज्ञा आंदोलन के दौरान 100 रुपये का ख़र्च मंज़ूर किया। बापू उस वक़्त यरवदा जेल में बंद थे।

मुझे यरवदा सेंट्रल जेल में विनियमन XXV, 1827 के तहत एक राज्य कैदी के रूप में हिरासत में लिए गए एम.के. गांधी के रखरखाव के लिए प्रति माह 100 रुपये के भत्ते को मंजूरी देने वाले, दिनांक 5 मई 1930 के बॉम्बे सरकारी प्रस्ताव संख्या S.D. 1361 की एक प्रति इसके साथ अग्रेषित करने का निर्देश दिया गया है, और यह बताने का निर्देश दिया गया है कि इस कैदी की कैद के कारण होने वाले खर्चों को भारत सरकार के खाते में “29-राजनीतिक केंद्रीय – शरणार्थी और राज्य कैदी – अन्य शरणार्थी और राज्य कैदी” शीर्षक के तहत डेबिट करने का प्रस्ताव है। इस संबंध में, मुझे बंगाली राज्य कैदी सतीश चंद्र पाकराशी के खाते पर समान खर्चों के डेबिट के संबंध में, दिनांक 7 जून 1927 के बॉम्बे सरकार के पत्र संख्या 1353/2-C का उल्लेख करना है।

​यरवदा, 10 मई, 1930

​प्रिय मेजर डॉयल,

​हमारी बातचीत पर विचार करने के बाद, मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि मुझे सरकार द्वारा दी गई विशेष सुविधाओं से, जहाँ तक संभव हो, बचना चाहिए!

​मैं सरकार के माध्यम से किताबें और समाचार पत्र नहीं चाहता। समाचार पत्रों के संबंध में, यदि अनुमति हो तो मैं ये मँगाऊँगा: ​द बॉम्बे क्रॉनिकल, ​द टाइम्स ऑफ इंडिया, ​इंडियन सोशल रिफॉर्मर, ​मॉडर्न रिव्यू, ​यंग इंडिया और नवजीवन (हिंदी और गुजराती)।

​यदि इनकी अनुमति दी जाती है, तो मैं यह मानकर चलता हूँ कि इन्हें विकृत (mutilated) नहीं किया जाएगा।

​सरकार ने मासिक भत्ते के रूप में 100 रुपये का सुझाव दिया है। मुझे आशा है कि मुझे इसके पास भी किसी चीज़ की आवश्यकता नहीं होगी। मैं जानता हूँ कि मेरा भोजन एक महँगी चीज़ है। यह मुझे दुखी करता है, लेकिन यह मेरे लिए एक शारीरिक आवश्यकता बन गया है।

​मुझे आशा है कि सभी सुविधाओं को स्वीकार न करने के लिए न तो आप और न ही सरकार मुझे अकृतज्ञ समझेंगे। यह मेरे साथ एक सनक (या इसे जो भी कहा जाए) है कि हम सभी मेहनतकश, आधे भूखे करोड़ों लोगों के खर्च पर जी रहे हैं। मैं यह भी जानता हूँ कि मेरी मितव्ययिता से होने वाली बचत, मेरे चारों ओर होने वाली बर्बादी के असीमित महासागर में एक नगण्य बूंद ही हो सकती है, चाहे मैं जेल में हूँ या उसके बाहर—बाहर तो और भी ज़्यादा। फिर भी, मैं स्वीकार करता हूँ कि मनुष्य को केवल बहुत कम करने की ही शक्ति दी गई है। वह उस थोड़े से हिस्से को करने में चूक नहीं सकता।

​पुनः, मैं जेल के व्यवहार के बारे में उग्र विचार रखता हूँ। मेरा मानना है कि एक हत्यारे को भी अपनी ज़रूरतें पूरी करने का उतना ही अधिकार है जितना किसी अन्य कैदी को। इसलिए जो चाहिए वह एक यांत्रिक कामचलाऊ व्यवस्था नहीं, बल्कि एक मानवीय समायोजन है।

​एक बात का मुझे उल्लेख करना चाहिए, मैं उन सत्याग्रही कैदियों के साथ संपर्क की आवश्यकता महसूस करता हूँ जो इस जेल में हैं। मुझे उनसे अलग करना पूरी तरह से अनावश्यक, अमानवीय और क्रूर है।

​आपका शुभचिंतक, एम.के. गांधी

​[नीचे नोट]: इसका पाठ डॉयल द्वारा 11 मई को गृह विभाग को संप्रेषित किया गया था।

बॉम्बे सीक्रेट एब्स्ट्रैक्ट्स, 750(5)-A; साथ ही S.N. 19971

सवाल है- गांधीजी ने क्या उसे स्वीकार किया?

इसका जवाब वाट्सएप पर नहीं मिलेगा और लोग बिना सच्चाई जाने राष्ट्रीय संग्रहालय के उस दस्तावेज को आगे फारवर्ड कर देते हैं और मान बैठते हैं कि गांधी सचमुच खर्च के लिए 100 रुपए हर महीने अंग्रेजी हुकूमत से लेते थे।

दरअसल, ये बातें सावरकर की पेंशन लेने वाली बात को पृष्ठभूमि में रखकर फैलाई जाती हैं, ताकि यह कहा जा सके कि अरे गांधी भी तो अंग्रेजों से खर्च लेते थे।

लेकिन, सच तो यह है कि बापू ने उस 100 रुपये की मदद को साफ ठुकरा दिया था। और उसे ठुकराते हुए उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को कितना सख्त पत्र लिखा था। पत्र खुद स्पष्ट है।

यदि कोई आपके समक्ष अधूरी बात परोसे तो उसके समक्ष यह पत्र आप भी परोस दीजिए। उसकी बोलती बंद हो जाएगी।

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