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क्या बढ़ते सरकारी कर्ज और बढ़ते टैक्स के बावजूद आम आदमी का जीवन बेहतर हुआ?

Editor Tej Prakaash

13 वर्षों में रिकॉर्ड कर्ज, रिकॉर्ड टैक्स वसूली और फिर भी 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन—क्या यह विकास मॉडल पर बड़ा सवाल है?

पिछले लगभग 13 वर्षों में भारत की अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ा है, जीएसटी लागू हुआ है, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर संग्रह में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है और केंद्र सरकार का कुल सार्वजनिक कर्ज भी उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है। सरकार का तर्क है कि इस धन का उपयोग बुनियादी ढांचे, रक्षा, रेलवे, डिजिटल सेवाओं, कल्याणकारी योजनाओं और आर्थिक विकास में किया गया है।

लेकिन इसके समानांतर एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठता है—यदि सरकार ने पहले की तुलना में कहीं अधिक कर्ज लिया और कहीं अधिक टैक्स वसूला, तो क्या उसी अनुपात में आम नागरिक के जीवन स्तर में सुधार दिखाई देता है?

यही प्रश्न आज आर्थिक और राजनीतिक बहस का केंद्र बनता जा रहा है।

बढ़ता सरकारी कर्ज: विकास का साधन या भविष्य का बोझ?

सरकारें विकास परियोजनाओं के लिए कर्ज लेती हैं। यदि उस निवेश से रोजगार, उद्योग, आय और उत्पादकता बढ़ती है, तो भविष्य में वही अर्थव्यवस्था उस कर्ज का बोझ संभाल सकती है।

भारत में पिछले वर्षों में कुल सार्वजनिक ऋण लगातार बढ़ा है। सरकार का कहना है कि यह वैश्विक महामारी, आर्थिक प्रोत्साहन, बुनियादी ढांचा निर्माण और दीर्घकालिक विकास रणनीति का हिस्सा है।

लेकिन आलोचकों का तर्क है कि कर्ज का मूल्यांकन केवल उसकी राशि से नहीं बल्कि उसके परिणामों से होना चाहिए।

टैक्स संग्रह में रिकॉर्ड वृद्धि

जीएसटी लागू होने के बाद कर संग्रह में लगातार वृद्धि हुई है। आयकरदाताओं की संख्या भी बढ़ी है। पेट्रोल-डीजल पर लंबे समय तक ऊंचे कर, विभिन्न अप्रत्यक्ष कर और डिजिटल निगरानी से सरकार की राजस्व क्षमता पहले से कहीं अधिक मजबूत हुई है।

इसका स्वाभाविक प्रश्न है—

जब सरकार के पास पहले से अधिक संसाधन उपलब्ध हैं, तब क्या नागरिकों पर आर्थिक दबाव कम हुआ है?

आम आदमी की वास्तविक स्थिति

देश के अनेक परिवार आज भी महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य पर बढ़ते खर्च, छोटे व्यवसायों की चुनौतियों और आय में सीमित वृद्धि जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं।

यदि विकास व्यापक स्तर पर हुआ होता, तो बड़ी संख्या में लोगों की सरकारी सहायता पर निर्भरता कम होती।

80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन—सफलता या चिंता?

सरकार प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत लगभग 80 करोड़ लाभार्थियों को मुफ्त खाद्यान्न उपलब्ध करा रही है।

समर्थकों का कहना है कि यह दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम है जिसने करोड़ों लोगों को भूख से बचाया।

वहीं आलोचक पूछते हैं—

यदि अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, टैक्स संग्रह रिकॉर्ड स्तर पर है और विकास अभूतपूर्व है, तो फिर इतनी बड़ी आबादी को आज भी मुफ्त राशन की आवश्यकता क्यों है?

क्या यह गरीबी के बने रहने का संकेत है या सामाजिक सुरक्षा की सफलता?

दोनों दृष्टिकोणों पर गंभीर बहस आवश्यक है।

क्या GDP वृद्धि ही पर्याप्त पैमाना है?

सिर्फ GDP बढ़ जाना ही पर्याप्त नहीं माना जाता।

वास्तविक विकास का आकलन इन संकेतकों से भी होता है—

  • रोजगार के अवसर
  • वास्तविक आय में वृद्धि
  • गुणवत्तापूर्ण शिक्षा
  • सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं
  • कृषि आय
  • छोटे उद्योगों की स्थिति
  • महिलाओं और युवाओं की आर्थिक भागीदारी
  • मध्यम वर्ग की क्रय शक्ति

यदि इन क्षेत्रों में अपेक्षित सुधार नहीं दिखता, तो केवल आर्थिक आंकड़े नागरिकों की वास्तविक स्थिति नहीं बताते।

सरकार का पक्ष

सरकार का कहना है कि—

  • एक्सप्रेसवे, रेलवे, एयरपोर्ट और बंदरगाहों का तेजी से निर्माण हुआ।
  • डिजिटल इंडिया और यूपीआई ने दुनिया में नई पहचान बनाई।
  • रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ी।
  • प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) से भ्रष्टाचार कम हुआ।
  • करोड़ों घरों तक बिजली, गैस, शौचालय और जल जैसी सुविधाएं पहुंचीं।

इन उपलब्धियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

आलोचकों की चिंताएं

आर्थिक विशेषज्ञों और विपक्ष के कुछ नेताओं का कहना है कि—

  • रोजगार सृजन अपेक्षित स्तर पर नहीं हुआ।
  • युवा बेरोजगारी चिंता का विषय बनी हुई है।
  • महंगाई ने मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग पर अतिरिक्त दबाव डाला।
  • छोटे व्यापारियों और सूक्ष्म उद्योगों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
  • बढ़ते सरकारी कर्ज का बोझ अंततः भविष्य की पीढ़ियों पर पड़ सकता है।

असली सवाल

लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है—

क्या बढ़ते सरकारी कर्ज और बढ़ते टैक्स के अनुपात में आम नागरिक का जीवन भी उतना ही बेहतर हुआ है?

यदि उत्तर “हाँ” है, तो उसके स्पष्ट सामाजिक और आर्थिक संकेतक दिखाई देने चाहिए।

यदि उत्तर “नहीं” है, तो नीति निर्माण, सार्वजनिक व्यय और विकास मॉडल की समीक्षा पर खुली चर्चा होना भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है।

निष्कर्ष

भारत आज दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। लेकिन किसी भी आर्थिक मॉडल की अंतिम कसौटी केवल GDP, टैक्स संग्रह या सरकारी परियोजनाएं नहीं होतीं।

वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब—

  • गरीब सरकारी सहायता पर कम निर्भर हों,
  • युवाओं को पर्याप्त रोजगार मिले,
  • मध्यम वर्ग पर कर का बोझ संतुलित हो,
  • छोटे व्यवसाय फलें-फूलें,
  • और नागरिकों की आय तथा जीवन गुणवत्ता में स्पष्ट सुधार दिखाई दे।

बढ़ते कर्ज और बढ़ते टैक्स के साथ-साथ यदि नागरिकों का जीवन भी उसी गति से बेहतर होता है, तभी विकास का लाभ वास्तव में व्यापक माना जाएगा। अन्यथा यह प्रश्न लगातार पूछा जाता रहेगा कि इतने संसाधनों के बावजूद आम आदमी को उसका अपेक्षित आर्थिक लाभ क्यों नहीं मिल रहा?

(संपादकीय: यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आर्थिक आंकड़ों, सरकारी दावों और सार्वजनिक विमर्श पर आधारित विश्लेषण है। पाठकों को विभिन्न आधिकारिक स्रोतों और स्वतंत्र आर्थिक अध्ययनों का भी अध्ययन करना चाहिए।)

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