दैवी चेतना का उदय और असत्य की पराजय

दैवी चेतना का उदय और असत्य की पराजय : दिव्य ज्योति नामक भगवान की वाणी के खंड के पृष्ठ संख्या 159 से 164 तक से साभार लिया गया…..
सत्य की मर्यादा यह नहीं होती कि चाहे कोई सत्य का अपमान कर दे।
सत्य की मर्यादा यह नहीं होती, कि जो भी चाहे सत्य का अपमान कर सकता है।
सत्य तुम्हारा मान भी है, तुम्हारा जीवन भी तुम्हारे जीवन का आधार भी, तुम्हारा अपना कर्त्तव्य भी। फिर जिस सत्य को, भौतिक जीवन में भी बाँधा है, उस सत्य को भौतिक संसार की निधि मान कर नहीं, अपने जीवन की भी नहीं; मेरी ही निधि मान कर, इसकी रक्षा करो। उसका संचय बिखरने न दो।
चारों ओर से आती हुई आसुरी शक्तियाँ धीरे-धीरे उस पर, अपना अधिकार करने की चेष्टा में सक्रिय हैं। इसी के लिये मैंने तुम्हें सचेत रहने के लिये कहा था। मगर सचेत रहने की बात होने से भी, क्या जो होना होता है, वह क्या नहीं होता? वह तो होता ही है। इसलिये यह समय, उन्हीं के सचेत होकर, तुम पर आक्रामक होने का है।
आसुरी शक्तियों से रक्षा करने मैं खड़ा हूँ, मैं सचेत हूँ।
अब यह समय और आगे क्या देता है, यह तो शीघ्र ही; स्वयं भी देखोगी। किसी प्रकार भी, कहीं, जो भी तुम पर आक्रामक होना चाहेगा; या तुम्हारे जीवन की मर्यादा पर आघात करके तुम्हारा जीवन, चिन्ता और दुःख में समाना चाहेगा, तो इसके लिये तुम्हें नहीं, ‘मैं’ ही सचेत हूँ। यह जीवन तुम्हें कुछ देकर ही जायेगा। लाने की चेष्टा करते हुये भी इसकी रक्षा में (जब) मैं स्वयं खड़ा हूँ, क्या ले जा पायेगा?
इस समय का भी अपना ही महत्त्व होगा। इस समय की उपलब्धि, हर ओर से आती आसुरी शक्तियों पर पड़ता हुआ, तुम्हारी दिव्यता का वह प्रभाव होगा, जो उनका जीवन ही बदल देगी। सत्य के समझने का ढंग भी बदल जायेगा।
तुमसे सत्य का जन्म होगा। सत्य के साकार होकर आने का यह समय है।
सत्य के साकार होकर आने का यह समय तुम्हारे जीवन में से, सत्य का ज्ञान देने का समय होगा।
तुमसे जो जन्म सत्य का होगा, वह जन्म ही पहचाना जायेगा, अन्यथा शरीर तो सभी एक जैसे दिखते हैं।
मगर शरीर को असत्यता में बंद कर, असत्य को ही धर्म, असत्य को ही न्याय, असत्य का ही मंत्र जपने वाले भी होते हैं।
सत्य रूप में इस शरीर को जीने वाले, सत्य को ही जीवन का रूप मानकर धारण कर लेते हैं। फिर इस शरीर का ही नया जन्म हो जाता है जब यह शरीर, इसी तरह शरीर दिखते हुये भी, पूर्ण सत्य, दिखाई भी देने लगता है।
सत्य को ही जीवन का रूप मानकर धारण कर लेने पर, शरीर का ही नया जन्म हो जाता है। शरीर पूर्ण सत्य दिखाई भी देने लगता है।
शीघ्र ही जीवन की वे स्थितियाँ बनेंगी जो भूतपूर्व ही होंगी, अर्थात् जिस तरह की स्थितियाँ आज से पहले कभी नहीं हुईं; और जब सत्य के जीवन के साथ, स्थितियाँ बनती हैं, तब हर प्रकार की ही स्थितियाँ बनती हैं, जो संसार की दृष्टि में, कभी प्रतिकूल दिखती हैं, कभी अनुकूल दिखाई देती हैं? मगर वास्तव में, केवल प्रतिकूल दिखाई देतीं हैं, वह प्रतिकूलता वास्तव में प्रतिकूल होती भी नहीं। उसमें भी अनुकूलता ही छिपी होती है।
दैवी-आसुरी शक्तियों का संघर्ष समाप्ति पर है। सत्य के ही स्थिर हो जाने का समय है।
अब यह भी समझ लो कि अभी तक आपके सामने, सत्य के आधार पर जीवन को टिकाने में, आता हुआ संसार के द्वारा एक संघर्ष था और वह संघर्ष, दैवी-आसुरी शक्तियों के बीच में, सदा ही होने वाला संघर्ष भी था; और मेरे विधान के अर्न्तगत भी था। मगर अब वह संघर्ष समाप्ति पर ही है। इसकी समाप्ति हमेशा के लिये ही समाप्ति का अवसर देगी। केवल सत्य के ही स्थिर हो जाने का समय है।
संघर्षों की आँधी में डगमगा कर ठहरना सीख जाओ। जीवन कसौटी पर कसा जाता रहा, वह कसौटी तुम्हारे रूप को निखारती गई। निखरा रूप तुम्हारे सामने है।
हर पल आती आँधी से जीवन जब बार-बार डगमगा कर ठहरना सीख गया, तब जीवन एक ऐसी कसौटी पर कसा भी जाता रहा, जो कसौटी तुम्हारे रूप को निखारती गई।
अब उसका निखरा हुआ रूप तुम्हारे सामने है। शीघ्र ही, समय तुम्हारे जीवन को, उस ओर ले जायेगा, जहाँ तुम्हारी आवश्यकता है। यह तुम्हारे जीवन के भविष्य के रूप लेने का ही अवसर है।
अनास्था के उस युग में, धर्म का हाथ पकड़े रहो। धर्म स्वयं तुम्हारा संबल बन जायेगा।
रूप मेरा न्याय का है तो अन्याय आपके साथ नहीं होने दूंगा।
संसार में जब मेरा रूप न्याय का है, तब क्या अन्याय आपके साथ, कहीं भी होगा तो होने दूंगा?
मनुष्य केवल मनुष्य ही होता है। इससे अधिक वह कुछ भी नहीं होता; और मनुष्य तो जानती ही हो कि वह दुर्बलताओं का पुतला होता है, दुर्बलता ही उसका जीवन भी होती है। इसीलिये उसका व्यक्तित्व उसी दुर्बलता का अधिकार होता है। सब आसुरी रूपों से ग्रस्त होता है। अधिकार दुर्बलता का रहता है, तब वह साधारण मानव नहीं रहता। मानवीय रूपों को ही; मानव-रूप मान, कर, अपनाता रहता है।
अब वह मेरा न्याय रूप भी देखोगे, तुम्हारे जीवन का न्याय, किस प्रकार करता है? तुम्हारे जीवन का न्याय, तुम्हारे किसी पूर्व जन्म के, किये कर्मों का न्याय तो नहीं, यह तो वर्तमान का ही हिस्सा है। बार-बार जन्म लेने वाले का जीवन कर्मों के न्याय से बँधा होता है। मेरे लिए कर्म करने के लिए अवतरित होने वाले जीवन का न्याय, मात्र संसार के द्वारा मिलते हुए उसे संघर्षों के आधार पर होता है, जो हर संघर्ष का परिणाम बनकर भी होता है, और उन्हें उनके अहंकार में ही परास्त करके भी होता है। उनका अस्त्र अहंकार ही होता है। वही उनका जीवन, वही उनका अस्त्र होता है।
तुम्हारा निर्धारित भविष्य सत्य होने जा रहा है।
वह अहंकार किस तरह समाप्त होता है, यह तो देखोगी ही, उन स्थितियों के बीच जब तुम्हारा निर्धारित भविष्य सत्य होने जा रहा है।
जब कभी आगे बढ़ोगे, उतना ही असत्य भी बढ़ेगा ही। यह तो नियम ही है। वह भी अपना स्थान बनाने का प्रयत्न करेगा ही। फिर यही तो संघर्ष होते हैं जीवन के, जिनका सामना करना ही पड़ता है।
सत्यमेव जयते
जो नियम ही है, उसकी चिन्ता भी क्यों करो?; क्योंकि जो भी हो, जय तो सदा सत्य की ही होती है। इसलिये हर हालत में, असत्य पराजित होगा ही। यह छोटे-मोटे रूप तो, उसकी उस बुझती चिंगारी के ही हैं, जिनका अपना, वास्तव में तो, कोई अस्तित्व है ही नहीं।
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