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सिद्ध शक्तिपीठ सत्य मंदिर

 
 

मैं मनुष्यों के भीतर और बाह्य सभी रूपों को हर क्षण देखता-पहचानता रहा हूँ : भगवान

आज का समय एक रावण का नहीं, अनेकों रावणों से भी बढ़ कर राक्षसों का है। वे जब-जब आयेंगे, भेष बदल कर ही आयेंगे।


विश्वास कभी असत्य में नहीं बदलता

divyajyoti bhag7

दिव्य ज्योति (भगवान की वाणी) अध्याय-६ (२२ अगस्त, १९९४)व्यक्ति को पहचान कर ही उस पर अपना विश्वास दो। हर व्यक्ति इतना विश्वसनीय भी नहीं है कि उसे सभी कुछ इस तरह समझ और दे दिया जाय कि उसके पश्चात् मन से निर्भय और निश्चिन्त हो सको। मनुष्य में असत्य ही अधिक होता है। सत्य बहुत ही कम होता है और जितना कम सत्य होगा, उसी रूप में मनुष्य का मन और कर्मों का रूप होगा। जब मन में असत्य अधिक होता है, तो उसे सभी कुछ असत्य जैसा ही अशक्तRead More