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Festival Satire

 
 

व्यंग्य : गरबे का जोश, शरीर बेहोश!

(संजय एम तराणेकर) व्यंग्य : गरबे का जोश : पहले गरबा भक्ति का माध्यम था। लोग माता की आराधना कर कुछ कदम घूमते थे, प्रसाद खाकर घर लौट आते थे। अब गरबा राष्ट्रीय स्तर का आयोजन बन गया है, जिसमें भक्ति से ज्यादा ड्रेस, डांस, फोटो और सोशल मीडिया की रीलों का महत्व है। गरबे वाली जोड़ियाँ एक दूसरे को “म्हारा सोणा रे…” गाकर मस्त हो जाती हैं। लो भाई, माता की आरती पाँच मिनट में समाप्त। माता रानी भी सोचती होंगी-“मेरे भक्तों, मेरी पूजा कर रहे हो या अपनेRead More