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प्रहलाद जी का अडिग संकल्प जिसने जीवन सार्थक कर दिया

असीम सत्य और ईश्वर का एक रूप

सत्य जो असीम है जिसको हम सीमित नहीं कर सकते। सत्य को हम अपने शब्दों में परिभाषित नहीं कर सकते।

सत्य वह तेज है, वह चीज है, जो आप जानते हैं आपको सौभाग्य प्राप्त हुआ है, “श्रीकृष्णचेतनावतार देवी माँ” के माध्यम से भगवत कृपा के तीव्र अवतरण को देखने का।

आज से कुछ माह पूर्व जब हमने ‘त्रिशूल-रूप’ दर्शन किए, पिछले वर्ष के वार्षिकोत्सव में, वो भगवान का संकेत है कि चाहे ‘त्रिशूल-रूप’ हो या ‘ॐ’ रूप हो, किसी भी शारीरिक रूप से, ऊपर है भगवान तो एक ही हैं।

भक्त प्रहलाद का अडिग विश्वास और नरसिंह अवतार

ऐसे में मैं दोबारा प्रहलाद महाराज के समय के उस युग में वापस जाऊँगा जब उनसे पूछा गया, कि क्या इस खंभे के अंदर भी भगवान हैं? उन्होंने बोला हाँ। उनको क्या-क्या यातनाएँ और कठिनाइयाँ नहीं सहनी पड़ीं, किन्तु उनका विश्वास अडिग था।

स्वयं उनके पिता से उनको ऐसी स्थितियाँ मिलीं किन्तु वो उनका विश्वास था, जिससे भगवान विष्णु स्वयं अपने ‘नरसिंह’ अवतार में अवतरित हुए। वो अवतार विस्मय करने वाला है, कह सकते हैं कि इस रूप में उस युग के पहले किसी ने भगवान को नहीं देखा था, लेकिन भगवान ने वो रूप लिया अपने भक्त को संरक्षण देने के लिए।

तो प्रहलाद महाराज का वह संकल्प जिसने उनके जीवन को सार्थक कर दिया, सुरक्षित रखा, वरना वह असुर, जो कितनों की जान लेता था, उसने बालक को भी नहीं छोड़ा।

जीवन में कठिनाइयों का उद्देश्य : जीवन को संवारना

असुर हर प्रकार की कठिनाइयाँ पैदा करते हैं। तो जो कठिनाइयाँ आपके जीवन में आती हैं, वो भगवान की ही इच्छा होती है आपको संवारने के लिए, आपको आगे बढ़ाने के लिए।

देवी माँ का संकल्प और विरोधियों की पराजय

यह फिर से मैं बोल रहा हूँ, “श्रीकृष्णचेतनावतार देवी माँ” के जीवन में मुझे यह देखने का सौभाग्य मिला। कठिनाइयाँ बहुत आई, प्रतिकूल स्थितियाँ आई, लेकिन न ही उन्होंने हार मानी, न ही वे थकीं, उनके मन में कभी कोई दुविधा नहीं आई कि ये क्यों मेरे साथ ऐसा हो रहा है, ये विचार नहीं आया कि संकल्प लेने से मेरा कुछ चला तो नहीं जाएगा।

कई शक्तिशाली लोगों ने विरोध करने की चेष्टा की किन्तु क्या हुआ? आप में से जो लोग जानते हैं, वे जानते हैं कि उनके साथ क्या हुआ। विरोधी हर कोशिश करेंगे, लेकिन सत्य धर्म, न्याय के भक्त को और “आध्यात्मिक गुरु दिव्य शक्ति माँ” जी को कोई हानि नहीं पहुँचा सकता, हानि करने की चेष्टा करने वाले स्वयं समाप्त हो गये।

पृष्ठ 56-57 संघर्षों पर विजय (वाणी खंड)
योगीराज अभिनव जी के दिव्य प्रवचन से






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