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Google AI Data Center: विशाखापट्टनम में गूगल के एआई डेटा सेंटर पर बढ़ा विवाद

google ai data centre in vishakhapattnam

जंगल, पानी और स्थानीय लोगों की आजीविका पर उठे गंभीर सवाल

विशेष रिपोर्ट | Hotlink News (खबरों की खबर)

विशाखापट्टनम: आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम में प्रस्तावित Google AI Data Center परियोजना को लेकर पर्यावरण, जल संसाधनों और स्थानीय समुदायों के अधिकारों पर नई बहस शुरू हो गई है। लगभग 160 एकड़ क्षेत्र में विकसित किए जाने वाले इस प्रोजेक्ट के लिए जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों में बदलाव की आशंकाओं ने ग्रामीणों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं की चिंता बढ़ा दी है।

विशाखापट्टनम में प्रस्तावित Google AI Data Center को लेकर जंगल, जल संकट, भूमि अधिग्रहण और पर्यावरणीय प्रभाव पर विवाद तेज। जानिए ग्रामीणों, विशेषज्ञों और गूगल के दावों की पूरी रिपोर्ट।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि जिन जमीनों पर वे वर्षों से खेती, वन संसाधनों और आजीविका के लिए निर्भर रहे हैं, अब वही भूमि परियोजना के लिए अधिग्रहित की जा रही है। ग्रामीणों का दावा है कि शुरुआती सर्वेक्षण के दौरान उन्हें भरोसा दिया गया था कि उनकी जमीनों पर उनका अधिकार बना रहेगा, लेकिन अब स्थिति बदलती दिखाई दे रही है।

ग्रामीणों का दावा: “हम डेटा नहीं पी सकते”

परियोजना का विरोध कर रहे कई ग्रामीणों का कहना है कि तकनीकी विकास अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन यदि उसकी कीमत स्थानीय लोगों की जमीन, जंगल और जल संसाधनों से चुकानी पड़े तो यह विकास टिकाऊ नहीं माना जा सकता। उनका कहना है कि जंगल ही उनकी आजीविका और जीवन का आधार हैं।

Google का पक्ष: एयर कूलिंग तकनीक से होगी पानी की बचत

गूगल का कहना है कि प्रस्तावित डेटा सेंटर में Air Cooling Technology का उपयोग किया जाएगा, जिससे पारंपरिक डेटा सेंटरों की तुलना में पानी की खपत कम होगी। कंपनी का यह भी दावा है कि बिजली अवसंरचना (Power Infrastructure) पर आने वाला खर्च वह स्वयं वहन करेगी।

हालांकि, परियोजना के आलोचक कहते हैं कि केवल तकनीकी दावों के आधार पर भविष्य के पर्यावरणीय प्रभावों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

इंडोनेशिया का उदाहरण क्यों दिया जा रहा है?

पर्यावरण कार्यकर्ता इंडोनेशिया के बाटाम (Batam Island) का उदाहरण दे रहे हैं, जहां डेटा सेंटरों के विस्तार के बाद जल संकट को लेकर स्थानीय लोगों ने चिंता जताई। वहां कई परिवारों ने घरेलू जलापूर्ति प्रभावित होने की शिकायत की और टैंकरों पर निर्भर रहने की स्थिति बनने की बात कही।

हालांकि, विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि किसी एक क्षेत्र की स्थिति को सीधे दूसरे देश या परियोजना पर लागू करने से पहले स्थानीय भूगोल, जल प्रबंधन और सरकारी नीतियों का अलग-अलग मूल्यांकन आवश्यक है।

चिली में भी उठे थे सवाल

चिली की राजधानी सैंटियागो के निकट क्विलिकुरा (Quilicura) क्षेत्र में संचालित बड़े डेटा सेंटरों को लेकर भी पर्यावरण संगठनों ने भूजल और वेटलैंड्स पर संभावित दबाव की चिंता जताई थी। लंबे समय से सूखे की स्थिति झेल रहे इस क्षेत्र में डेटा सेंटरों की जल खपत सार्वजनिक बहस का विषय बनी रही है।

विशाखापट्टनम में क्या हैं मुख्य चिंताएँ?

विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों द्वारा उठाए जा रहे प्रमुख मुद्दे—

  • जंगल और जैव विविधता पर संभावित प्रभाव।
  • स्थानीय समुदायों की आजीविका और भूमि अधिकार।
  • भूजल एवं जल संसाधनों पर संभावित दबाव।
  • बिजली की बढ़ती मांग और ऊर्जा अवसंरचना।
  • परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों का दीर्घकालिक आकलन।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

विशेषज्ञों का मानना है कि AI और Cloud Infrastructure भविष्य की आवश्यकता हैं, लेकिन बड़े डेटा सेंटर स्थापित करने से पहले पर्यावरण प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment), जल उपलब्धता, स्थानीय समुदायों की सहमति तथा पुनर्वास जैसी प्रक्रियाओं का पारदर्शी तरीके से पालन होना चाहिए।

निष्कर्ष

विशाखापट्टनम का प्रस्तावित Google AI Data Center भारत के डिजिटल भविष्य की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। वहीं दूसरी ओर स्थानीय लोगों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं की चिंताएँ यह सवाल भी उठाती हैं कि तकनीकी विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। आने वाले समय में इस परियोजना की सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि विकास, पारदर्शिता और स्थानीय हितों के बीच संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जाता है।

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