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जीवन की अंधी दौड़ और अमर सत्य: क्या हम अमूल्य श्वासों को मिट्टी में तो नहीं मिला रहे?

जीवन की इस ऊहापोह में कौन क्या कर रहा है, ये वो खुद नहीं जानता? मतलब क्या मतलब ये है कि सब कुछ अंधकार में है!

लेखक: तेज प्रकाश वेबसाइट: हॉटलिंक न्यूज़ (Hotlink News – आध्यात्मिक और वैचारिक खंड)

परिचय

क्या हम अमूल्य श्वासों को मिट्टी में तो नहीं मिला रहे? अभी कल की ही बात है जब कोरोना आया और सैकड़ों लोग रोज श्मशान घाट में जलाए जाने लगे। अनजान लोगों की तरह, अनजान लोगों के द्वारा, अनजान लोगों के हाथों… उस समय लोग अपनों के अंतिम संस्कार में शामिल भी नहीं हो पा रहे थे। मौत कब आ जाए और कोरोना कब दबोच ले, किसी को कुछ पता नहीं था।

अंधेरा असल में होता क्या है? जब कुछ समझ न आए, जब हाथ को हाथ न दिखाई दे और आगे का रास्ता चलना दूभर हो जाए—बिल्कुल वैसा ही समय था कोरोना काल। जब कोरोना के खौफ से लोग अपने ही घरों के अंदर कैद हो गए थे।

हर तरफ एक अंतहीन डर था। समझ नहीं आ रहा था कि इस महामारी का अंत कब होगा, यह संकट कब टलेगा और कब घर से निकलना सामान्य हो पाएगा।

कोरोना का जाना और इंसानी फितरत का सच

और फिर, एक दिन कोरोना विदा हुआ। महामारी के जाने के दो-चार महीने के भीतर ही जनजीवन सामान्य हो गया और लोग कोरोना को भूलने लगे। कुछ दिनों तक तो लोगों ने मास्क पहने रखे, लेकिन धीरे-धीरे मास्क भी उतर गए और सब पहले की तरह बिल्कुल निर्भय, निश्चिंत होकर जीने लगे।

यह स्थिति एक प्रकार से अज्ञानता की अवस्था जैसी ही है। और अज्ञानता भी अपने आप में एक गहरा अंधेरा ही है। इसीलिए प्राचीन काल से हम ईश्वर से प्रार्थना करते आए हैं—असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय (हमें असत्य से सत्य की ओर और अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो)।

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में कोई कुछ नहीं जानता कि वह क्या कर रहा है और क्यों कर रहा है? हम सब बस दौड़े जा रहे हैं। इस अंधी दौड़ में कोई पैसे के पीछे भाग रहा है, कोई प्रेम पाने के लिए परेशान है, तो कोई पद और प्रतिष्ठा के लिए अपनी जान खपा रहा है। इस अंधी दौड़ में हर आदमी दौड़े जा रहा है, दौड़े जा रहा है।

अमूल्य जीवन और क्षणभंगुर सुख का सौदा

किसी को नहीं मालूम कि उसके पास कितना समय बचा है और वह उसका उपयोग कहां कर रहा है। गोस्वामी तुलसीदास जी ‘रामचरितमानस’ में बहुत गहरा सत्य लिखते हैं:

“मानिक मुक्ता कर ते देहीं, कांच किरिच बदले में लेही”

अर्थात, हम लोग कर क्या रहे हैं? हमारे पास यह अमूल्य मानव जीवन रूपी माणिक और मोती है, लेकिन इसके बदले हम कांच के टुकड़ों (क्षणिक सुखों) को पाने के लिए अपनी पूरी उम्र लुटा रहे हैं।

हम नष्ट हो जाने वाली, क्षणभंगुर चीजों के पीछे अपने इस अनमोल जीवन और उसकी हर एक सांस को बर्बाद कर रहे हैं। अनमोल जीवन को देकर हम ऐसी चीजें खरीद रहे हैं जिनका कोई स्थाई वजूद नहीं है।

जीवन का अंतिम सत्य: राम नाम सत्य है

और अंत में क्या होता है? सब कुछ यहीं छूट जाना है। खाली हाथ आए थे, खाली हाथ जाना है। जब विदाई का समय आता है, तो केवल एक ही अंतिम सत्य गूंजता है—“राम नाम सत्य है, हरि का नाम सत्य है।”

सत्य बोलिए, उसी में मुक्ति है। भौतिकता की इस अंधी दौड़ से थोड़ा वक्त निकालकर अपने भीतर झांकने की जरूरत है। क्षणिक सुखों के पीछे अमूल्य श्वासों को गंवाने से बेहतर है कि जीवन के वास्तविक उद्देश्य और आध्यात्मिक शांति को पहचाना जाए।

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