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आकाश की गम्भीर आवाज़ों का तांडव

bhagani ki vani ch 12 divya jyoti part 2

अध्याय – १२ / १० मई १९९४ (भगवान की वाणी के दिव्य ज्योति वाणी खंड भाग 2 के पृष्ठ सं। 95-99 से साभार लिया गया )

आकाश की गम्भीर आवाज़ों का तांडव, बाढ़, तूफान, भयंकर आग के रूप में बढ़ती प्रलय की बाँहे

समय के गर्भ में, सभी कुछ समाता चला जाता है, मगर यह कोई सोचता भी नहीं। किसी की दृष्टि भी, इस बीतते समय की ओर जाती भी नहीं, क्योंकि रोज यह सब होने जैसी ही बात लगती है। मगर अब यह अगर उसी तरह देखते रहे, तो समय के साथ, जिस सत्य को समझ सकते हो, वह सत्य, बीतकर भी न बीतने वाला सत्य, मगर तुम्हारी दृष्टि की पकड़ में भी न आ पाने वाले सत्य के रूप में ही रह जायेगा।

जहाँ भी जो हो रहा है, वह भी अभी बड़ा ही साधारण सा जानो; क्योंकि उस समय बड़ी स्थिति तो वही होगी, जब प्रकृति का कोई भी तत्व आकर उस स्थान का, सब कुछ ही समेट कर ले जाता और बहुत थोड़ा ही छोड़ जाता दिखेगा।

अभी भी अपने आपको अधर्म-असत्य से दूर कर दो

यह प्रकृति के द्वारा ही, ऐसी चुनौती है, जो अवसर दे रही है, कि अभी भी अपने आपको अधर्म-असत्य से दूर कर दो। वह समय अपने आप ले जाने वाला नहीं, दे जाने वाला होगा। यह तुम्हारा भाग्य ही होगा, जो तुम्हारी बुद्धि में प्रेरणा दे देगा, तभी तुम्हारे लिये अवसर होगा भाग्य के कुछ क्षणों का संचय कर लेने का।

चारों ओर से बढ़ती गंभीर आवाज भी प्रलय की बाँहों में, कहीं बाढ़, कहीं तूफान, कहीं भयंकर आग, कहीं देखोगे कि जिस आकाश को अभी तक, उसके किसी ऐसे रूप को नहीं देखा था, जो इसका अपना ही रूप होता है, मगर अब तो आकाश को, उसकी गम्भीर आवाज़ में भी सुनोगे, जो आवाज़ कभी कृष्ण के आगमन की सूचना और असुरों के विनाश की सूचना दे रही थी, अब वही आवाज़ कितनी तेज होती है और कैसी होती है, मगर क्या उस आवाज़ में भी, मुझे ही सुन पाओगे?

विश्व में गूँजती मेरी वाणी, अनेकों रूपों में अब सुनोगी, मगर उसके रूप, प्रकृति के द्वारा भी सुनाई देंगे।

अब समय आकाश की उस आवाज़ का होगा, जो अपने ही अनेकों रूपों में कभी धरती पर आ कर अपना तांडव दिखायेगा, कभी इसके रूप, उसकी आवाज़ जैसे होंगे; और वे सभी को दिखाई और सुनाई भी देंगे।

जीवन का एक ऐसा रूप आपके सामने है, जो आज तक इसके पहले कभी नहीं देखा था, जो देखा था उसके आधार पर, जीवन का रूप, अर्थ और महत्व, वैसा नहीं लगा था, जैसा जिस रूप में, मैं आज, तुम्हारे सामने बता रहा हूँ।

धर्म से सम्बन्ध जोड़कर आज मनुष्य ने अपनी लालसाओं इच्छाओं और वृत्तियों की तृप्ति को ही, जीवन का धर्म बना लिया है।

अभी तक तो, जिसके पास, सभी सुख, ऐश्वर्य और सम्पन्नता थी, उसे जीवन सुख का साधन (बन कर), मन की सारी इच्छाओं की तृप्ति करा गया, और सम्पन्न जैसा लगता रहा, क्योंकि मनुष्य ने धर्म से संबंध छोड़ कर, लालसाओं, इच्छा और वृत्तियों को ही जीवन का धर्म मान लिया।

इस तरह से, धर्म भी वैसा ही बना लिया गया, जितना भी, जो दे सके, वही कार्य करो। धर्म और भगवान नाम का प्रयोग भी, वहीं तक ठीक और उसी प्रकार का ठीक है, जिसके द्वारा आपके स्वार्थ, पूरे होते रहे, तुम्हारी वृत्तियों की सन्तुष्टि होती रहे।

सत्य से तो तुम इतने दूर रहे, जितना रह सकते थे, असत्य में इतना डूबे कि असत्य की सुन्दरता ही तुम्हें, सत्य की सुन्दरता जैसी लगने लगी।

मगर सत्य को जब जाने ही नहीं तब आपके लिये, सत्य क्या और असत्य क्या?

आज जब संसार में धर्म का नाम भी समाप्ति पर आ गया, तब संसार के हर कोने में, केवल अधर्म ही अपना एकछत्र राज्य जमा कर बैठा दिखाई देने लगा। जब तुम्हारे जीवन पर, उस असत्य ने आक्रमण किया, तब तुम्हें वह कष्ट जैसा लगा; और तब तुमने सोचा कि भला कैसा भगवान है, जो तुम्हारे सारे अर्पण लेकर भी, तुम्हारा कष्ट दूर नहीं कर रहा है?

  • आकाश की गम्भीर आवाज़ों का तांडव
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किन्तु यह नहीं जानते हो कि अगर तुम्हारा धर्म और तुम्हारा भगवान, तुम्हारा अपना ही बनाया हुआ है, तो वह मैं नहीं हूँ और तुम्हारा बनाया हुआ, धर्म ही तो यह धर्म है जिसका नाम ‘धर्म’ दिया था, वास्तव में वह धर्म था ही नहीं, केवल अधर्म था, और तुम्हारी इच्छा-पूर्ति का साधन था।

फिर संसार में धोखे का अधर्म बढ़ाने वाला आधार, धर्म के नाम से था, और उसी रूप में तुम्हारा वह भगवान भी था, जो भगवान था भी नहीं, केवल तुम्हारे द्वारा उसे नाम ही भगवान का दे दिया गया, जो तुम्हारे धार्मिक कार्यों को पूरा करता रहे या असत्य स्वीकार करता रहे, मगर उसमें आपके कर्मों का फल, जो तुम्हारे जीवन पर बड़ा भारी पड़ता जा रहा है, उससे बचाने की शक्ति देने के लिए, उसके पास ऐसा कुछ नहीं था, जो तुमने उसे दे रखा हो।

फिर तुम्हारे कष्टों को दूर कौन करता? तुम्हारी रक्षा कौन करता? तुम्हारी समस्याओं का समाधान कौन करता?

समय की आँधी अत्यन्त ही विकराल रूप ले कर आ रही है।

आज समय तुम्हारे बनाये कर्म और तुम्हारे भगवान का नाम देकर बनाये हुये उन रूपों का नहीं, जिन्हें तुमने अपने धार्मिक कहलाने के लिए स्थापित कर रखा है। समय की आँधी अत्यंत ही विकराल रूप लेकर आ रही है। उसके उन हाथों में क्या है यह तो देखोगे ही। आज या कल, तुम तक उसे आना तो है ही।






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