मन के गहरे विश्वास के साथ मेरा हाथ पकड़ो, जीवन का सहारा पा जाओगे।

दिव्य ज्योति भाग 2 पृष्ठ संख्या 235 से 242 तक से उद्धृत
अध्याय-२६
मन के गहरे विश्वास के साथ मेरा हाथ पकड़ो, जीवन का सहारा पा जाओगे।
२३ मई १९९४
जीवन को सही अर्थों में जीने के लिये मन के गहरे विश्वास की आवश्यकता होती है, जो जीवन का सहारा बन सके।
उस सहारे को हर क्षण पा भी सकते हो, मगर सहारा छोड़ कर नहीं, उसे पकड़ कर ही पा सकते हो। स्थितियों में परिवर्तन होता ही है, जब तक मनुष्य मेरा हाथ नहीं पकड़ता, और जब पकड़ता है, दोनों ही स्थितियाँ भिन्न होती हैं?
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- अधर्म और असत्य ही, तुम्हारा अपना जीवन बन गया है : भगवान
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दिव्य ज्योति भाग 2 पृष्ठ संख्या 235 से 242 तक से उद्धृत अध्याय-२६ मन के गहरे विश्वास के साथ मेरा हाथ पकड़ो, जीवन का सहारा पा जाओगे। २३ मई १९९४ जीवन को सही अर्थों में जीने के लिये मन के गहरे विश्वास की आवश्यकता होती है, जो जीवन का सहारा बन सके। उस सहारे को हर क्षण पा भी सकते हो, मगर सहारा छोड़ कर नहीं, उसे पकड़ कर ही पा सकते हो। स्थितियों में परिवर्तन होता ही है, जब तक मनुष्य मेरा हाथ नहीं पकड़ता, और जब पकड़ता है,Read More - दया धर्म का मूल है! दया करो कृपा पाओगे!
योगिराज अभिनव जी द्वारा रचित भगवान की वाणी के संकलन संघर्षों पर विजय के पृष्ठ संख्या 30 -41 से साभार लिया गया. प्राप्ति स्थान सिद्ध शक्तिपीठ सत्य मंदिर बी 116/2 इंदिरा नगर लखनऊ बंटवारे से कोई भी चीज़ छोटी ही होगी, अगर आप संसारी चीज़ों को बाँटेंगे घर बाँटेंगे, अपने परिवार को बाँटेंगे कुछ भी आप विभाजन करेंगे तो वह कम ही होगा। सिर्फ जो असीम है वह कम नहीं हो सकता वह भगवान की कृपा है, वह धर्म है, मानवता है, आपकी दयालु भावना है। आपके निःस्वार्थ कर्म हैं,Read More - मैं सत्य रूप में ही मनुष्य को सब कुछ देने के लिये तत्पर भी रहता हूँ : भगवान
दिव्य ज्योति पृष्ठ संख्या 78 से 80 तक साभार अवतरित स्वयं में क्या है, जैसा है, क्या उसे होना चाहिये? अपने ही मूल्यांकन का दृष्टि-कोण, स्वयं उसके अपने मूल्यों को, किस तरह घटाता हुआ सिद्ध कर देता है, कि उसका अपना मूल्य जिस तरह जिस रूप में वह आज तक समझता रहा, वैसा उसमें कुछ भी नहीं है। समय रहते क्या होने जा रहा है, यह तो मैं बताता भी जा रहा हूँ; और यह भी बता रहा हूँ कि किस तरह, कहाँ पर अपनी अपूर्णता को दूर करके, स्वयंRead More - भयंकर रूप से, चारों ओर से आने वाली विपत्तियों का समय है
भगवान की वाणी के दिव्य ज्योति वाणी खंड के अध्याय 20 पृष्ठ 176 से 179 से साभार लिया गया है!प्राप्ति स्थान : सिद्ध शक्तिपीठ सत्य मंदिर, बी 116/2 इंदिरा नगर लखनऊ १८ मई १९९४ नास्तिक को भी मेरी पहचान की बुद्धि आ जायेगी। पशु-वध का खुला रूप कम होगा। चारों ओर से आने वाली विपत्तियों का समय है : संसार में हर ओर भयंकर रूप से चारों ओर से विपत्तियां आने वाली हैं। यह भी सत्य है इनका कारण तो, मात्र मेरा क्रोध ही है। यह सब जो कहोगे किRead More
कुछ ऐसे भी होते हैं, जो हाथ पकड़ना ही नहीं चाहते, जिनका अपने आप पर ही विश्वास सबसे अधिक होता है। वे स्वयं अपने ही आधार पर जीने वाले प्राणी होते हैं। उनका संसार उन्हीं के अपने बीच में रहता है।
मगर आज मैं उन लोगों की बात बताने आया भी नहीं हूँ, क्योंकि संसार तो अधिक से अधिक उन्हीं लोगों का क्रीड़ा-स्थल बना हुआ है, जो अपने लिये ही जी रहे और कर्म कर रहे हैं।
और ऐसे अपने लिये जीने वाले तो अपने ही आधार पर अपना धर्म बनाते हैं, अपने ही आधार, अपनी ही बनाई मर्यादाओं और मान्यताओं की कड़ियों को बाँध कर रहते भी हैं, और जो उनके अधीन हो सकता है अथवा जिन पर भी वे अधिकार कर सकते हैं, उन्हें भी उन्हीं कड़ियों से जकड़ कर रखना भी चाहते हैं।
वे आसुरी शक्तियों के दाहिने हाथ के रूप में ही संसार में काम करते हैं। इनके लिये तो इनका भाग्य ही पर्याप्त होता है।
मैं तो उस जीवन की राह हूँ, जो मुझे ही सहारा बना कर रहता है। वे जीवन, समर्पित विश्वास वाले होते हैं।
मनुष्यता के धर्म से गिरा मनुष्य पशु-पक्षी, कीट-पतंग, बिना शरीर के विचरती आत्माओं का जन्म पाता है।
तुम्हारा जीवन तो साधारण स्तर का है ही नहीं। इसे सभी समझ भी नहीं सकते, और जो समझ नहीं सकते, वे मुझसे कुछ पाने योग्य होते भी नहीं। मात्र संसार के लिये ही होते हैं। मनुष्य बन कर भी रहते हैं (फिर भी), जब मनुष्यता के धर्म से, इतना अधिक नीचे गिर जाते हैं कि अगला जन्म मनुष्य का पाने योग्य भी नहीं रहते।
तब उन्हें उनके कर्मों के स्तर के आधार पर ही, अन्य किसी भी प्रकार के पशु-पक्षी, कीट-पतंग या फिर बिना शरीर वाली आत्माओं के रूप में, संसार में विचरते रहने वाला ही (जन्म) मिलता है।
उनकी मुक्ति का अवसर भी, हमेशा उन्हें नहीं प्राप्त होता। उनकी मुक्ति का अवसर, यदि अवधि के अनुसार आ जाता है, तब वे मुक्त हो जाती हैं।
किन्तु आज के, जो भी ऐसे रूप आकार तुम्हारे जीवन से टकरायेंगे, वे भी इन्हीं अनेकों प्रकार के लोगों में से होंगे।
तुम्हारे जीवन में आने वाली स्थितियाँ भी अद्भुत और चमत्कारी भी होंगी, मगर संघर्षों से भरी भी होंगी, क्योंकि यह समय तो अधर्म और असत्य के परास्त होने का है।
किन्तु यह भी विश्वास रखना कि जटिल से जटिलतम परिस्थियों का सामना भी अगर तुम्हारे सामने होगा तो मैं ही उसका सामना भी करूँगा, और उन्हें परास्त भी करूँगा।
सत्य की तीक्ष्णता को सह पाना आसान होगा भी नहीं। शीघ्र ही, सभी स्थितियों में, अभूतपूर्व परिवर्तन होंगे। ये परिवर्तन इस प्रकार के होंगे, जैसे अंधकार सहसा ही समाप्त भी हो जाता है और प्रकाश फैल भी जाता है, सूर्योदय के पश्चात्। फिर किस कारण से तुम्हें चिन्ता हो?
मैं जिस प्रयोजन के लिये आता हूँ, उसे ही पूरा करने के लिये कुछ शरीरों को रचता हूँ।। पूनम उसमें से ही एक है।

आध्यात्मिक गुरु दिव्य शक्ति माँ पूनम जी
मैं जिस प्रयोजन को लेकर आता हूँ, उस प्रयोजन को पूरा करने के लिये ही, कुछ शरीरों को रचता हूँ।
पूनम भी उन्ही में से एक है जो अपना ही महत्त्व रखेगी। यह किसी साधारण स्थिति के बीच रह कर भी, अत्यन्त ही असाधारण स्थितियों को जन्म दे देगी, ऐसी स्थितियाँ जो आज तक, हर मनुष्य के जीवन में आई भी नहीं हैं।
उसके जीवन का यह भाग, जो संघर्षों से भरा हुआ ही है, मगर उन्हीं के बीच एक ऐसी स्थिति भी है, जो स्थिति उसके जीवन को गतिमान कर देगी। यह गति भी वही होती है, जो गति मुझसे प्राप्त हुई ही होती है।
इसका जीवन जो मेरे ही द्वारा, एक ऐसे जीवन के रूप में प्राप्त हुआ है, जिसका मूल्यांकन, साधारण सांसारिक दृष्टि कर भी नहीं सकती, मगर मूल्यों के निखरते ही तो सभी पहचान जाते हैं।
मनुष्य को, मेरे द्वारा दिये मूल्य से ही, पहचाना जाता है। ये मूल्य भौतिक जगत् के लिये भी नहीं होते। भौतिक जगत् में मिलते भी नहीं, क्योंकि ये मूल्य अध्यात्म जगत् के ही होते हैं, और अध्यात्म के द्वारा ही पहचाने भी जाते हैं। यह जिस तरह भी मैं चाहता हूँ मैं अपने अस्त्रों का प्रयोग करता हूँ। इस रूप में जानो (कि) आने वाले समय का भार भी उन्हीं हाथों में होगा जो शीघ्र ही देखोगी।
आज की स्थिति में, जो नहीं पहचाना जा रहा, क्या वह कल की स्थिति में भी वैसा ही होगा?
कब क्या होगा, क्यों होगा और किसका भविष्य मैंने किस रूप में रचा है, यह तो समय बतायेगा। मगर यह स्मरण रखना कि अब तक जो भी जीवन पाया था, वह जीवन ही उसका उसके जीवन-मरण और भाग्य व कर्मों की लड़ियों से बँधा था। मगर जीवन-मरण और भाग्य व कर्मों की लड़ियों से बँधा था।
मगर जीवन जो जीवन मैंने दिया है, वह जीवन नया ही है। इसकी गति भी मेरी ही होगी, इच्छा भी मेरी ही होगी, संचालन भी मेरा ही होगा, और जिस तरह, जहाँ भी, उसे आगे ले जाना होगा और कर्म भी जो मैंने दिया है, वह भी शीघ्र ही इसके द्वारा ही होगा, जो हर तरह ही उसका जीवन ही बदल देगा। शीघ्र ही उसके जीवन को भी बढ़ते, पनपते नये ही रूप में देखो।
यहाँ पर यह सोचना भी व्यर्थ होगा, कि मैं किसी के विषय में बता रहा हूँ, यह तो मात्र व्यक्तिगत बात है। नहीं, यह भी नये ही प्रकार से, मेरी वाणी से जुड़ी हुई, एक कड़ी ही है, जिसको बताना भी इसलिये है ताकि समय के साथ-साथ तुम्हारी भी पहचान बन सके।
सत्य की दिशा बताई ही जाती है। उसका जीवन असत्य से कभी न जुड़ पाने वाला होता है। इसीलिये जो अनिवार्य ही होता है उसे उसी रूप में जानना भी चाहिये।
संसार साधना-स्थल है, कर्मयोगी का। यह संसार मनुष्य की साधना का स्थल होता है। यहाँ मेरे भक्त साधना करने आते हैं। कर्मयोगी कर्म करने आते हैं, और भोगी केवल भोग भोगने ही आते हैं।
बात भोगियों की नहीं, यहाँ बात केवल योगियों की ही हो रही है और जब तक स्थिति ही न आये, तब तक न तो कोई साधना कर सकता है, न ही कोई योगी बन सकता है, और न ही कोई कर्मयोगी बन सकता है।
इसलिये हर साधारण इंसानों से जटिल स्थितियाँ आती हैं, उनके जीवन में जिन्हें मैं कर्मयोगी ही बना कर लाता हूँ।
यह न समझना कि वे यहाँ जन्म ले कर, तब कर्मयोगी बन पाते हैं। इसे इसी तरह जानो कि जिस तरह मैं संसार में अवतरित होता हूँ, तब ऐसा नहीं कि मैं संसार में हूँ नहीं इसलिए मुझे जन्म लेने की विधि और माता का गर्भ रचना होता है।
मैं तो अजन्मा होते हुए भी, जन्म लेता ही रहता हूँ। संसार में साधारण मनुष्यों के बीच रह कर भी तो धर्म करते हुए पहचाना जाता हूँ, अवतार रूप में।
इसी तरह, जब मैं अवतार लेता हूँ, उस अवतरित रूप में भी, संपूर्ण सत्य होते हुए भी, संघर्ष और समस्यायें, सभी कुछ दिखाई देती हैं। मगर जीवन उन समस्याओं और संघर्षों के लिये होता नहीं है। इसीलिये जगत् में इन्हें ये शरीर ही झेलते हैं, संसार को मेरा परिचय देने के लिये। आत्मा नहीं झेलती।
संसार में योगी भी शरीर को ही बनाना होता है, इसलिये नहीं कि वह शरीर जो आत्मा धारण किये होती है, उसके लिये ज़रूरी होता है। जब आत्मा उस शरीर को धारण किये होती है, तब आत्मा जैसा चाहती है, शरीर की गति बन कर कार्य करवाती भी है।
मगर यह तो, संसार के लिये, यह ज्ञान देने के लिये ही होता है, कि मैं भी जब शरीर धारण करता हूँ, तो सभी साधारण से साधारण स्थितियों के बीच भी, मुझे अपने आपको तपाना भी पड़ता है, और सभी को झेल कर, सभी के हर भाव से मुक्त मन रख कर, इन पर विजय प्राप्त किस तरह की जाती है, यह संसार के लिये खुली किताब की तरह, सभी कुछ सिखा देता है।
स्थितियों को साधना का साधन-मात्र मानकर देखो, भाग्य की क्षीणता का रूप न मानो।
भाग्य को उसका कारण नहीं मानना चाहिये, कि स्थितियाँ जो सामने आतीं जा रही हैं, इनका कारण, कहीं भी भाग्य की क्षीणता भी हो सकती है। केवल इन स्थितियों को साधना का साधन मान कर देखो। धीरे-धीरे मन सध कर तपस्वी का ही बन जाता है जो गहरी शक्ति से भरा हुआ ही होता है।
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