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सुरक्षा बनाम अभिव्यक्ति: संवैधानिक संतुलन ही लोकतंत्र की असली ताकत

संपादकीय (Editorial)

संपादक/स्तंभकार: तेज प्रकाश

बंद कमरे में टिप्पणी करना आसान, सुरक्षा हटा दी तो भीगी बिल्ली बनने में देर नहीं लगेगी: Yogi Adityanath, CM, UP

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का हाल ही में पुलिस सुधारों और कानून-व्यवस्था के सुदृढ़ीकरण पर दिया गया बयान प्रशासनिक प्राथमिकताओं और संवैधानिक अधिकारों के बीच की लकीर को रेखांकित करता है। मुख्यमंत्री ने सुरक्षित माहौल को समृद्धि की पहली शर्त बताया और कहा कि ‘आपकी सुरक्षा, हमारा संकल्प’ राज्य का ध्येय वाक्य है। इसी क्रम में उन्होंने टिप्पणी की कि सुरक्षा के बिना अराजकता के माहौल में कोई भी टिक नहीं सकता।

हालाँकि, एक सजग समाज और लोकतंत्र के नाते हमें इस बात को अत्यंत गंभीरता से समझना होगा कि सुरक्षा का अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कोई एक-दूसरे के विपरीत खड़े रहने वाले मूल्य नहीं हैं, बल्कि ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

भारतीय संविधान के दो प्रमुख स्तंभ—अनुच्छेद 21 (जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) और अनुच्छेद 19(1)(a) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता)—एक-दूसरे के पूरक हैं। संविधान देश के हर नागरिक को सुरक्षित वातावरण में रहने का अधिकार देता है, लेकिन साथ ही उसे अपने विचार खुलकर व्यक्त करने, सत्ता की नीतियों का विश्लेषण करने और स्वस्थ आलोचना करने की भी आजादी प्रदान करता है।

कल्याणकारी राज्य का बुनियादी काम 14 लाख से अधिक सीसीटीवी कैमरे लगाना, आधुनिक कमांड एंड कंट्रोल सेंटर स्थापित करना और पुलिसबल को मजबूत करना हो सकता है, परंतु सुरक्षा तंत्र का निर्माण कभी भी नागरिकों की स्वतंत्र आवाज को दबाने का कारण नहीं बनना चाहिए।

संपादक की दृष्टि में:

  • सुरक्षा भयमुक्ति का साधन है: राज्य अगर सुरक्षा सुनिश्चित करता है, तो वह इसलिए ताकि नागरिक बिना किसी डर के जी सकें और अपने संवैधानिक अधिकारों का उपयोग कर सकें।
  • संवाद लोकतंत्र की रीढ़ है: बंद कमरों में टिप्पणी हो या सार्वजनिक मंचों पर उठने वाले सवाल, नागरिकों की अभिव्यक्ति ही लोकतंत्र को मजबूत और पारदर्शी बनाती है।

एक सशक्त लोकतंत्र वही है जहाँ राज्य अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी के तहत नागरिक को सुरक्षा की पूरी गारंटी दे और नागरिक बिना किसी संकोच के अपनी बात रख सके। तकनीक और पुलिस सुधारों की सराहना अवश्य होनी चाहिए, लेकिन यह विकास तभी सार्थक होगा जब इसमें संवैधानिक मूल्यों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान अडिग रहे।






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