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JNU Graffiti Controversy: दीवारों पर लिखे नारों से फिर गरमाई कैंपस राजनीति

दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) एक बार फिर राजनीतिक विवाद के केंद्र में है। विश्वविद्यालय परिसर की दीवारों पर लिखे गए “Free Umar Khalid” और “Long Live Naxalbari” जैसे नारों ने नई बहस को जन्म दिया है।

यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब देश में विश्वविद्यालय परिसरों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, छात्र राजनीति और राष्ट्रवाद को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है।

JNU प्रशासन ने मामले का संज्ञान लेते हुए जांच की बात कही है। वहीं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने इन नारों पर आपत्ति जताते हुए कार्रवाई की मांग की है।

JNU में लिखे गए ‘Free Umar Khalid’ नारे का क्या मतलब है?

“Free Umar Khalid” का अर्थ है उमर खालिद की रिहाई की मांग।

उमर खालिद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व शोध छात्र रहे हैं। उन्हें सितंबर 2020 में दिल्ली दंगों से जुड़े कथित बड़े षड्यंत्र मामले में गिरफ्तार किया गया था।

उनके खिलाफ गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (UAPA) के तहत मामला दर्ज किया गया।

दिल्ली में फरवरी 2020 में हुए दंगों में 53 लोगों की मौत हुई थी। जांच एजेंसियों ने आरोप लगाया था कि कुछ लोगों ने हिंसा की साजिश रची थी। उमर खालिद ने इन आरोपों से इनकार किया है।

उनके समर्थक लंबे समय से उनकी गिरफ्तारी और लंबे समय तक जेल में रहने को लेकर सवाल उठाते रहे हैं, जबकि विरोधी पक्ष इसे गंभीर आरोपों से जुड़ा मामला बताता है।

Umar Khalid UAPA Case: विवाद क्यों बना हुआ है?

उमर खालिद मामले में मुख्य बहस दो पहलुओं पर केंद्रित रही है—

1. जांच एजेंसियों का पक्ष

जांच एजेंसियों का आरोप है कि मामला केवल व्यक्तिगत भाषणों तक सीमित नहीं बल्कि बड़े षड्यंत्र से जुड़ा है।

2. मानवाधिकार और नागरिक स्वतंत्रता से जुड़े सवाल

उमर खालिद के समर्थक और कुछ नागरिक अधिकार समूह यह सवाल उठाते रहे हैं कि मुकदमे की लंबी प्रक्रिया और लंबे समय तक हिरासत न्याय व्यवस्था के लिए चुनौती है।

भारत में UAPA जैसे कड़े कानूनों को लेकर भी समय-समय पर बहस होती रही है।

‘Long Live Naxalbari’ नारा क्या है? जानिए 1967 के आंदोलन का इतिहास

JNU में सामने आया दूसरा प्रमुख नारा “Long Live Naxalbari” है, जिसका संबंध भारत के इतिहास के एक महत्वपूर्ण लेकिन विवादित आंदोलन से है।

नक्सलबाड़ी आंदोलन की शुरुआत कब हुई?

नक्सलबाड़ी आंदोलन की शुरुआत वर्ष 1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी क्षेत्र में हुई थी।

यह आंदोलन मुख्य रूप से भूमि अधिकार और किसानों के मुद्दों से जुड़ा था।

उस समय कुछ वामपंथी नेताओं ने सशस्त्र क्रांति के रास्ते को समर्थन दिया, जिसके बाद यह आंदोलन धीरे-धीरे देश के कई हिस्सों में फैल गया।

नक्सलबाड़ी आंदोलन से नक्सलवाद तक का सफर

नक्सलबाड़ी विद्रोह भारतीय राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ माना जाता है।

इससे जुड़े विचारों ने आगे चलकर कई नक्सली संगठनों को प्रभावित किया।

हालांकि समय के साथ भारत सरकार ने माओवादी और नक्सली हिंसा को आंतरिक सुरक्षा चुनौती के रूप में देखा।

वहीं कुछ वामपंथी समूह इसे सामाजिक और आर्थिक असमानताओं के खिलाफ संघर्ष के रूप में देखते रहे हैं।

JNU और छात्र राजनीति का पुराना इतिहास

JNU लंबे समय से भारत के सबसे सक्रिय राजनीतिक कैंपसों में गिना जाता है।

यहां अलग-अलग विचारधाराओं से जुड़े छात्र संगठन सक्रिय रहे हैं।

विश्वविद्यालय में पहले भी कई मुद्दों पर विवाद हुए हैं—

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

राष्ट्रवाद और देशद्रोह की बहस

छात्र संगठनों के बीच टकराव

राजनीतिक नारों और कार्यक्रमों को लेकर विवाद

JNU की पहचान केवल अकादमिक संस्थान के रूप में नहीं बल्कि राजनीतिक बहस के केंद्र के रूप में भी बनी रही है।

ABVP ने क्या आपत्ति जताई?

ABVP ने आरोप लगाया है कि कैंपस की दीवारों पर लिखे गए राजनीतिक संदेश विश्वविद्यालय के माहौल को प्रभावित करते हैं।

संगठन ने मांग की है कि प्रशासन जिम्मेदार लोगों की पहचान करे और कार्रवाई करे।

हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

Jamia Graffiti Controversy से कैसे जुड़ा है मामला?

JNU विवाद से एक दिन पहले दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में भी कथित तौर पर कुछ राजनीतिक नारे लिखे जाने का मामला सामने आया था।

इनमें “Free Kashmir” और “Free Sharjeel Imam” जैसे नारे शामिल होने की बात कही गई।

इस घटना के बाद राजनीतिक दलों और विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से प्रतिक्रियाएं आईं।

दोनों घटनाओं ने एक बार फिर सवाल खड़ा किया है कि विश्वविद्यालय परिसरों में राजनीतिक अभिव्यक्ति की सीमा क्या होनी चाहिए।

JNU Graffiti विवाद: अभिव्यक्ति की आजादी बनाम कैंपस अनुशासन

यह पूरा विवाद दो बड़े सवालों के बीच खड़ा है—

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

भारतीय संविधान नागरिकों को विचार व्यक्त करने का अधिकार देता है।

सार्वजनिक संस्थानों की जिम्मेदारी

वहीं विश्वविद्यालय प्रशासन का दायित्व है कि परिसर में शांति, अनुशासन और शैक्षणिक वातावरण बना रहे।

इसी संतुलन को लेकर JNU जैसे संस्थानों में समय-समय पर बहस होती रही है।

निष्कर्ष

JNU में “Free Umar Khalid” और “Long Live Naxalbari” जैसे नारों ने केवल एक दीवार विवाद को जन्म नहीं दिया है, बल्कि भारत में चल रही पुरानी बहसों को फिर सामने ला दिया है।

जहां एक पक्ष इसे राजनीतिक अभिव्यक्ति और अधिकारों का मामला मानता है, वहीं दूसरा पक्ष इसे कैंपस अनुशासन और राष्ट्रीय मुद्दों से जोड़कर देखता है।

अब नजर इस बात पर होगी कि JNU प्रशासन की जांच में क्या सामने आता है और क्या इस मामले में कोई कार्रवाई की जाती है।

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