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व्यंग्य: जेल जमानत और प्राइम टाइम का लोकतंत्र

जेल जमानत और प्राइम टाइम का लोकतंत्र : कुछ पत्रकारों के लिए लोकतंत्र का सबसे बड़ा पैमाना अब यह नहीं कि सवाल कौन पूछ रहा है, बल्कि यह है कि सवाल किससे पूछा जा रहा है।

CJP नेताओं की गिरफ्तारी और जेल भेजे जाने पर भी बहस शुरू हो गई। मुद्दा था — गिरफ्तारी सही या गलत? लेकिन टीवी की दुनिया में असली सवाल कुछ और था — “इस पर किस एंगल से शोर मचाया जाए?”

कुछ आवाजों ने कहा — “कानून अपना काम कर रहा है।”
सवाल यह है कि क्या कानून हमेशा एक ही रफ्तार और एक ही नजर से काम करता है?

जब सत्ता के खिलाफ आवाज उठती है तो उसे व्यवस्था के लिए खतरा बताया जाता है, लेकिन जब वही आवाज सत्ता के पक्ष में होती है तो उसे राष्ट्रहित की पत्रकारिता कहा जाता है।

जेल जमानत और प्राइम टाइम का लोकतंत्र :

वाह रे लोकतंत्र!
यहां कभी-कभी अपराध से ज्यादा चर्चा इस बात पर होती है कि आरोपी किस विचारधारा के करीब है।

प्राइम टाइम में फैसला पहले लिखा जाता है, बहस बाद में होती है।
स्क्रीन पर अदालत लगती है, एंकर जज बनता है और जनता सिर्फ दर्शक।

लेकिन लोकतंत्र की असली ताकत तालियां नहीं, सवाल हैं।

क्योंकि जिस दिन पत्रकार सवाल पूछने वालों से ज्यादा सवाल पूछने वालों पर सवाल उठाने लगेंगे, उस दिन खबर और प्रचार के बीच की लाइन बहुत छोटी रह जाएगी।

और शायद यही सबसे बड़ा व्यंग्य है —
कुछ लोग लोकतंत्र बचाने के लिए नहीं, लोकतंत्र की अपनी-अपनी परिभाषा बचाने के लिए लड़ रहे हैं।

क्योंकि आज की सबसे बड़ी खबर यह नहीं कि कौन जेल गया…
सबसे बड़ा सवाल यह है कि कौन सी आवाज जेल के बाहर रह गई।






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