अधर्म और असत्य ही, तुम्हारा अपना जीवन बन गया है : भगवान

जब धर्म का रूप समझकर ही, धर्म को मन, वचन, कर्मों का रूप दोगे, धर्म स्वयं तुम्हारे जीवन में आधार बन जायेगा।
धर्म को अगर अपने मन के अनुसार किन्हीं विधि-विधानों में बाँध कर, धर्म मान कर अपना सकते हो, तो मेरी वाणी को ही, केवल जीवन के संपूर्ण रूप में स्वीकार करके, धर्म क्यों नहीं मान सकते? या फिर वैसा ही जीवन, क्यों नहीं बना सकते?
सच यहाँ पर यह है कि अधर्म और असत्य ही, तुम्हारा अपना जीवन बन गया है।
जिस तरह किसी भी बाग में, एक ही तरह के फूल या फल होते हैं, तो वहाँ वैसी ही सुगन्ध या वैसा ही रूप होता है; और तुम्हारा जीवन भी, किसी तुममें से एक का नहीं तुममें से हरेक का ही, हर व्यक्ति का, स्वयं का जीवन ही अधर्म और असत्य से रंग गया है।
फिर किसी को पता ही नहीं लगता है कि अधर्म और असत्य कहाँ है?
जहाँ भक्ति हो रही है, जहाँ कीर्तन-भजन हो रहा है, व्रत-उपवास चल रहे, तीर्थ नहाने जा रहे, वहाँ सभी कुछ (जो) हो रहा, वह भी भक्ति है। जहाँ मेरी ही मूर्ति रखकर, मेरे सामने पशु-वध करके कहा जा रहा है कि तुम मेरी पूजा में (यह पशु-वध) इसलिये कर रहे हो कि यह पूजा का भाग है, वहाँ भी भक्ति है, जहाँ हर रोज़ मांस-मदिरा का सेवन हो रहा, वहाँ भी भक्ति है, जहाँ पशुओं को मार कर बेचा भी जा रहा, उस धन से मदिरा भी पी जा रही, वहाँ भी भक्ति हो रही है, जहाँ निर्दोष रक्त बहा कर, गंगा में मिला कर अपना पाप धोने के लिये, उसी पानी में नहाया जा रहा, वहाँ भी भक्ति है, जहाँ जाति और धर्म के आधार पर परस्पर हत्या की जा रही, वहाँ भी धर्म है, जहाँ मेरे मन्दिर-मस्जिद बनाकर तोड़े जा रहे।
वहाँ भी भक्ति है। फिर वास्तव में तुम्हारे संसार में अधर्म है ही कहाँ?
जो हो रहा है सब कुछ धर्म और सत्य है। जबकि सच यह है कि इसी कारण से, सारा संसार केवल अधर्म और असत्य का ही खुला रूप बन गया है।
अब मैं जो तुम्हें जीवन देने जा रहा हूँ, अब उस ओर देखना। मैं भी तुम्हारे जीवन की, जगह-जगह से तोड़कर तुम्हारे धर्म और तुम्हारी भक्ति का फल देने ही तो आया हूँ। यह संसार उन्हीं के लिये बना था और आज भी उन्हीं के लिये बनेगा, जो वास्तव में धर्म और सत्य पर आधारित हैं।
न्याय रूप को, तुम्हें अपना परिचय देना नहीं होगा। वह स्वयं तुम्हारा परिचय पा लेगा, और अपनी ही दृष्टि से खोज कर, केवल उन्हें ही जीने और रहने का स्थान देगा, जो सच में ही धर्म और सत्य पर आधारित हैं।
मेरी न्यायशक्ति की आँख, तुम्हारी आँखों से देखकर निर्णय नहीं लेती। यह आँख वह है जो सारे संसार के, एक-एक प्राणी को, अपने ही नेत्रों से देखती है और अपने आधार पर ही सारे निर्णय देती है।
आती हुई आँधी जो न्याय की है (उसमें) तिनकों की भाँति उड़ते उन्हें देखो, जो मनुष्य की आँख में गिर कर उसकी आँख की किरकिरी बन कर ही कष्ट दे रहे हैं।
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