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ECINET विवाद, केंद्रीय नियंत्रण और निष्पक्ष चुनाव

इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट

हाल ही में The Hindu, The Wire और The Indian Express जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों द्वारा प्रकाशित खोजी रिपोर्टों ने भारतीय चुनाव आयोग (ECI) की डिजिटल प्रणालियों—विशेषकर ECINET और ERONET—की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियों (Electoral Rolls) के प्रबंधन, विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR) और एकीकृत नागरिक सेवाओं के लिए लाए गए इस नए सॉफ़्टवेयर पर गंभीर आरोप लगे हैं कि इसने संविधान प्रदत्त और वैधानिक रूप से विकेंद्रीकृत चुनावी ढांचे को दरकिनार कर दिया है।

भारतीय जनप्रतिनिधित्व कानून और चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार, मतदाता सूचियों में नाम जोड़ने, संशोधित करने या हटाने की अंतिम वैधानिक शक्ति ज़मीनी स्तर के निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों (EROs) के पास होती है। हालांकि, ECINET की सॉफ्टवेयर वास्तुकला (Architecture) और इसके कोड के स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट से यह खुलासा हुआ है कि इस प्लेटफॉर्म ने केंद्र (नई दिल्ली) से राज्यों की पूरी चुनावी प्रक्रिया पर अत्यधिक नियंत्रण स्थापित कर लिया है।

इस विस्तृत रिपोर्ट में हम तथ्यों, आंकड़ों, मीडिया खुलासों और तकनीकी विश्लेषण के आधार पर ECINET विवाद के हर पहलू का गहराई से अध्ययन करेंगे।

1. पृष्ठभूमि: ECINET और ERONET क्या हैं?

पारंपरिक रूप से भारत में मतदाता पंजीकरण और सूची संशोधन से जुड़े कार्य विभिन्न अलग-अलग पोर्टलों, ऑफलाइन फॉर्म और राज्य-स्तरीय डेटाबेस के माध्यम से संचालित होते थे। चुनाव आयोग ने डिजिटल इंडिया पहल के तहत ERONET (जो मुख्य रूप से डेटाबेस और पंजीकरण से जुड़ा है) और हाल ही में ECINET नामक एक व्यापक प्लेटफॉर्म की शुरुआत की।

  • एकीकरण (Integration): ECINET को लगभग 40 अलग-अलग पुराने ऐप्लिकेशन, डैशबोर्ड और वेबसाइटों को एक ही मंच पर एकीकृत करने के लिए डिज़ाइन किया गया था।
  • आधिकारिक दावा: चुनाव आयोग का यह तर्क था कि यह तकनीक एक ‘पैराडाइम शिफ्ट’ है, जो नागरिकों को ऑनलाइन फॉर्म भरने, आवेदन की स्थिति (Status) ट्रैक करने और शिकायतों का त्वरित निवारण करने में मदद करती है।
  • विवाद की जड़: लेकिन इस एकीकरण के साथ ही यह सॉफ्टवेयर एक ‘सेंट्रलाइज्ड कंट्रोल टॉवर’ में बदल गया, जहां राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों (CEOs) और जिला स्तर के अधिकारियों की निर्णय लेने की स्वायत्तता तकनीकी रूप से बाधित हो गई।

2. ‘द हिंदू’ और अन्य मीडिया रिपोर्टों के प्रमुख खुलासे

क. वैधानिक शक्तियों का केंद्रीयकरण (Central Control Over States)

भारतीय लोकतंत्र के विकेंद्रीकृत ढांचे के तहत प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र के EROs और AEROs स्वतंत्र रूप से अपने क्षेत्र के मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच करते हैं।

  • The Hindu की रिपोर्ट बताती है कि ECINET के आने के बाद राज्यों की प्रशासनिक मशीनरी को केंद्रीय सर्वर के अधीन कर दिया गया।
  • सॉफ्टवेयर के आंतरिक मॉड्यूल्स और कोडबेस के परीक्षण से यह बात सामने आई कि केंद्रीय स्तर पर बैठे अधिकारी यह तय कर रहे थे कि किस राज्य को कौन सा डेटा दिखेगा, किस प्रविष्टि को मंजूरी मिलेगी और किसे रोका जाएगा। इससे ज़मीनी अधिकारियों की भूमिका केवल ‘डाटा ऑपरेटर’ जैसी बनकर रह गई है।

ख. सॉफ्टवेयर की सीमाएं और ‘द वायर’ की रिपोर्ट (बूथ लेवल एजेंटों की सीमा का उल्लंघन)

  • चुनाव आयोग के स्थापित नियमों के अनुसार, कोई भी मान्यता प्राप्त बूथ लेवल एजेंट (BLA) ड्राफ्ट मतदाता सूची के प्रकाशन के बाद एक दिन में 10 से अधिक फॉर्म (विशेषकर नाम हटाने या आपत्ति दर्ज करने से संबंधित फॉर्म 7) जमा नहीं कर सकता।
  • हालांकि, दिल्ली और अन्य राज्यों में SIR प्रक्रिया के दौरान यह देखा गया कि राजनीतिक दलों के कुछ एजेंटों (जैसे एक ही पार्टी के एजेंट द्वारा दो दिनों में 35 से अधिक नाम हटाने के आवेदन दर्ज करना) ने इस सीमा को आसानी से पार कर लिया।
  • जब तकनीकी ऑडिट किया गया, तो यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि ECINET सॉफ्टवेयर में ऐसी कोई कोडिंग या प्रोग्रामिंग ही नहीं थी जो 10 फॉर्म की वैधानिक सीमा को स्वतः (Automatically) रोक सके। इस तकनीकी चूक या लापरवाही के कारण बड़े पैमाने पर थोक में नाम हटाने के आवेदन दर्ज किए गए।

ग. स्वचालित विसंगतियां (Auto-Generated Discrepancies) और बड़े पैमाने पर नाम विलोपन

  • ECINET में स्वचालित रूप से ‘तार्किक विसंगतियों’ (Logical Discrepancies) और डेटा मैपिंग की त्रुटियों को चिह्नित करने की क्षमता है।
  • उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल और दिल्ली जैसे चुनावी राज्यों में इस सॉफ्टवेयर ने बिना उचित ज़मीनी भौतिक सत्यापन (Physical Verification) के लाखों मतदाताओं के नाम संदेहास्पद श्रेणी में डाल दिए या हटा दिए।
  • विपक्षी दलों और राज्य अधिकारियों ने आरोप लगाया कि एल्गोरिदम आधारित इस एकतरफा विलोपन से वास्तविक मतदाताओं के मताधिकार पर सीधा असर पड़ा है।

3. तकनीकी ऑडिट और सुरक्षा चिंताएं (Security & Code Vulnerabilities)

स्वतंत्र तकनीकी विश्लेषकों और सिविक टेक समूहों द्वारा ECINET के सार्वजनिक रूप से उपलब्ध इंटरफेस और कोड की जांच करने पर निम्नलिखित गंभीर चिंताएं उजागर हुईं:

  1. हार्डकोडेड पाबंदियां (Hardcoded Restrictions): कोड की परतों में ऐसे स्ट्रिंग और कंडीशनल स्टेटमेंट्स मिले जो यह दर्शाते हैं कि केंद्रीय सर्वर से किसी भी समय किसी राज्य विशेष के डेटा एक्सेस को प्रतिबंधित किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, कोड में इस तरह के संदेश मिले: “View enumeration form details is not enabled for selected State”।
  2. साइबर सुरक्षा चेतावनियां: सुरक्षा विशेषज्ञों ने पहले ही चुनाव आयोग और CERT-In जैसी राष्ट्रीय एजेंसियों को सर्वर-साइड डेटा हैंडलिंग, अपर्याप्त प्रमाणीकरण और ऑटोमेटेड बॉट रिक्वेस्ट के खतरों के बारे में आगाह किया था।
  3. पारदर्शिता का अभाव: सॉफ्टवेयर के सोर्स कोड और इसके एल्गोरिदम के काम करने के तरीके को सार्वजनिक या राज्य विधानसभाओं के समक्ष पूरी तरह स्पष्ट नहीं किया गया है, जिससे तकनीकी पारदर्शिता पर सवाल उठे हैं।

4. राजनीतिक और प्रशासनिक प्रतिक्रिया

  • विपक्ष का तीखा हमला: कांग्रेस नेता जयराम रमेश, तृणमूल कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने ECINET सॉफ्टवेयर को लेकर चुनाव आयोग पर कड़े प्रहार किए हैं। उनका कहना है कि इस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करके सत्तारूढ़ दल के पक्ष में मतदाता सूचियों में हेरफेर की जा रही है।
  • संस्थागत टकराव: मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया कि चुनाव आयोग के भीतर ही कुछ आयुक्तों और वरिष्ठ अधिकारियों ने इस सॉफ्टवेयर की अखंडता और इसके जरिए राज्यों के अधिकारों के हनन को लेकर गहरी चिंता जताई थी, और यह मामला मंत्रिमंडल सचिवालय (Cabinet Secretariat) तक पहुंचा था।
  • चुनाव आयोग का पक्ष: हालांकि, चुनाव आयोग ने इन सभी आरोपों का खंडन करते हुए कहा है कि ECINET का उद्देश्य केवल चुनावी प्रक्रिया को पारदर्शी, कागज रहित (Paperless) और तेज़ बनाना है। आयोग का दावा है कि सभी प्रक्रियाएं कानून के दायरे में ही संचालित हो रही हैं।

5. निष्कर्ष और आगे की राह

ECINET सॉफ्टवेयर को लेकर उपजा विवाद महज़ एक तकनीकी खामी का मामला नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र के संघीय ढांचे (Federal Structure) और चुनाव आयोग की संस्थागत स्वायत्तता से जुड़ा एक गंभीर संकट है। जब तकनीक का इस्तेमाल विकेंद्रीकृत कानूनों को दरकिनार कर केंद्रीय नियंत्रण स्थापित करने के लिए किया जाता है, तो नागरिकों के मताधिकार पर संकट मंडराने लगता है।

लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए निम्नलिखित कदम उठाया जाना अनिवार्य है:

  1. स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट: ECINET और ERONET के पूरे कोडबेस और एल्गोरिदम का एक स्वतंत्र, निष्पक्ष तकनीकी ऑडिट कराया जाना चाहिए।
  2. वैधानिक सीमाओं का सॉफ्टवेयर में क्रियान्वयन: नियमों (जैसे BLA की 10 फॉर्म की सीमा) को सीधे सॉफ्टवेयर कोड में सख्ती से लागू किया जाना चाहिए ताकि कोई भी व्यक्ति या दल इसका उल्लंघन न कर सके।
  3. राज्यों की स्वायत्तता की बहाली: ज़मीनी स्तर के EROs की वैधानिक शक्तियों को बहाल किया जाए ताकि स्थानीय सत्यापन के बिना कोई भी बड़ा विलोपन न हो सके।

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