मैं मनुष्यों के भीतर और बाह्य सभी रूपों को हर क्षण देखता-पहचानता रहा हूँ : भगवान

संकलन : साभार दिव्य ज्योति (भाग 7) / भगवान की वाणी
प्राप्ति स्थान : सिद्ध शक्ति पीठ सत्य मंदिर, बी 116/2, इंदिरा नगर, लखनऊ
संदेश : प्रत्येक रविवार, शाम 5 बजे से 8 बजे तक – दिव्य आध्यात्मिक सत्संग
आध्यात्मिक गुरु शक्ति माँ पूनम जी एवं
दिव्य शक्ति योगिराज अभिनव जी के पावन सान्निध्य में
मनुष्यों के छद्म रूपों की पहचान, ढोंग का निवारण और जीवन में आस्था का वास्तविक स्वरूप
मगर यही समय है तुम्हारे लिये कि तुम मनुष्यों के किस रूप से बँध जाते हो? उनमें किस रूप की आस्था तलाशते हो, अथवा स्वयं उन पर ही तुम आस्था रखने लगते हो?
आस्थावान् कौन है, कौन नहीं, यह भी तो अभी तुम्हें सही अर्थों में नहीं मालूम है। जो तुम्हारे अपने विचारों से मिलता लगा अथवा जिसके जीवन से तुम्हें लाभ मिलता लगा, वही अच्छा लगने लगा।
मगर यहाँ जो मेरा ही अपना क्षेत्र है उसमें आने वाले हर व्यक्ति का रूप मैं भी स्वीकार नहीं करता। मैं मनुष्यों के भीतर और बाह्य सभी रूपों को हर क्षण देखता-पहचानता रहा हूँ। किसी भी मनुष्य को आस्थावान् की पवित्रता और पात्रता देने का प्रयास न करना।
जीवन की अनेकों परिस्थितियाँ आयेंगी जिनमें हर व्यक्ति पहचाना जायेगा और ऐसे लोग जो छद्म और पाखंडी रूपों में होंगे, वे तो इस तरह स्पष्ट दिखाई देने लगेंगे, जैसे तेज प्रकाश में पड़ा हुआ गंदा कचरा। जब तक अंधकार होता है, तभी तक किसी को कचरा दिखाई नहीं पड़ता। मगर जब प्रकाश आ जाता है, तब वह कचरा छिपता नहीं है।
आस्था गति भी है, शक्ति भी
आस्था जीवन माँगती है। जीवन पाना और पाते रहने का प्रयास करने वाला आस्थावान् नहीं होता।
आस्था तो जीवन माँगती है और जीवन बिना दिये, मात्र जीवन पाने और पाते रहने का प्रयास करते रहने वाला, कभी आस्थावान् नहीं होता।
स्वयं भी अपने आपको देखते रहो कि अब तक की आस्था के साथ जीवन में क्या सीखा? क्या अपने आपको मुझे दे देना या मुझे मात्र भौतिक उपलब्धियों का केन्द्र मानकर पकड़े रहना; अथवा अपने व्यक्तिगत जीवन के स्वार्थों के कारण, संकलनों का ढेर बढ़ाने के लिये, और के बाद और मिल सकता है के भाव से, आस्थावान् बने रहने का ढोंग करना?
आस्था का कवच और न्याय
आज के इस युग में, आस्था ही एक ऐसा कवच है, जो रक्षा करेगा। इस आस्था के कवच को जब मन पर धारण करोगे मन की रक्षा होगी। जब शब्दों पर धारण करोगे, शब्दों की रक्षा होगी। कर्मों में धारण करोगे, कर्मों की बागडोर मेरे हाथों में होगी।
जीवन में अपने आप ही अपना आत्म-दर्शन करो और भ्रमों में मत फँसो, क्योंकि अपने आप को आस्थावान् तो मानते ही रहे हो। मगर उस अपने आप जानी हुई आस्था का बल तुम्हें कुछ भी नहीं देने जा रहा है, न ही वह सहारा देगी; क्योंकि ढोंगी की अपनाई आस्था उसके लिये मेरे न्याय रूप में होगी, जो ढोंगी के ढोंग खोल कर दंड देगी। अपराधियों के अपराधों पर आघात करती हुई, अपराधियों के जीवन को ध्वस्त करेगी।
सत्य की पहचान और सतर्कता
वर्षा में भीगते, अभाव में रह कर भी, मुझ पर सत्य रूप में अपनी आस्था को टिकाये, मेरे चरणों की ओर बढ़ने वाले भक्त को तो सभी कुछ देगी।
सभी व्यक्ति यदि सत्य के भक्त होते, तो किसी भी कारण से संसार में असत्य और अधर्म क्यों बढ़ता?
सत्य अपना भी संभालो और दूसरे के अन्दर का सत्य मात्र पहचानो। हरेक तुम्हारा विश्वसनीय नहीं हो सकता।
मात्र मनुष्य स्वार्थी होने के कारण अपना प्रदर्शन किसी भी रूप में करता हो, मगर आवश्यकता संसार में विशेष रूप से इस समय सतर्कता की है, क्योंकि आज का समय एक रावण का नहीं, अनेकों रावणों से भी बढ़ कर राक्षसों का है। वे जब-जब आयेंगे, भेष बदल कर ही आयेंगे। उन रूपों को पहचानने वाला हर व्यक्ति राम तो नहीं होता। रावण भेष बदल कर आता है तो व्यक्ति अपने ही कारणों से छला भी जाता है।
बिखरे मोती
मनुष्य इंसान बनने का प्रयत्न करता रहे यह भी सबसे बड़ी पूजा है। मन का पूर्ण समर्पण और हर तरह से, मेरे हर रूप का स्वीकार ही, आवश्यक होता है।
आज का युग हर तरह अधर्म और असत्य का है। इस अंधकार से अपने को बचाओ और ‘अंधियारे का दीप’ जो आज तुम्हारे हाथ में है, अपना प्रकाश ले कर इस दीप का प्रकाश ही, तुम्हारी राह दिखायेगा।
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