विश्वास कभी असत्य में नहीं बदलता

दिव्य ज्योति (भगवान की वाणी) अध्याय-६ (२२ अगस्त, १९९४)
व्यक्ति को पहचान कर ही उस पर अपना विश्वास दो। हर व्यक्ति इतना विश्वसनीय भी नहीं है कि उसे सभी कुछ इस तरह समझ और दे दिया जाय कि उसके पश्चात् मन से निर्भय और निश्चिन्त हो सको। मनुष्य में असत्य ही अधिक होता है। सत्य बहुत ही कम होता है और जितना कम सत्य होगा, उसी रूप में मनुष्य का मन और कर्मों का रूप होगा।
जब मन में असत्य अधिक होता है, तो उसे सभी कुछ असत्य जैसा ही अशक्त और व्यर्थ लगता है, सत्य (भी)। वह मात्र अपने आपको ही शक्तिशाली जान कर, सत्य के विरुद्ध मन में भावनाओं और विचारों को पोषित करता हुआ, नई-नई योजनायें बनाता रहता है।[पृष्ठ 44]
केवल यह सोच लेना कि मेरी वाणी पर कोई विश्वास करता है या फिर मेरी वाणी को अच्छा या बुरा कह लेता है, मनुष्य के सत्य पर विश्वास का परिचय नहीं देता। उसके जीवन के हर पल में उसका अपना विश्वास बदलता रहता है। यह बदलने वाली स्थिति ही जो होती है, वह असत्य की ही होती है।
सत्य के भक्त का दिया विश्वास कभी असत्य में नहीं बदलता। जब भी तुम्हारा स्वभाव असत्य का होगा, स्वभाव में अविश्वास भी विष की तरह घुला होगा, जो समाज में किसी के लिए भी घातक होगा, परिवार के लिए भी। इतना ही नहीं कि वह दूसरों के लिये ही घातक हो। यह तो घातक, सबसे बढ़ कर स्वयं उस मनुष्य के लिये ही होता है, जो हर क्षण जब उस स्वभाव के प्रदूषण को साथ रखता है, तब उसे धीरे-धीरे रक्त की बड़ी ही भयंकर बीमारियाँ आरम्भ हो जाती हैं जिनकी गम्भीरता अभी नहीं समझते हो।[पृष्ठ 45]
मगर जब आज के समय में, इन रोगों का प्रवाह शरीर के अन्दर किस रूप में क्या दे रहा है और अब क्या देगा, जब देखोगे, तब स्वयं अगर मुझे मेरी वाणी में जानते हो तो मुझसे फिर पूछना भी नहीं होगा, क्योंकि उन रोगों का निदान संसार के किसी भी डॉक्टर, वैद्य या हकीम के पास नहीं होगा। यह स्वयं ही ठीक करना पड़ता है, अपने आपको ही। मूल्य जो बना रखे हैं, वे (मूल्य) तुम्हारे मन को सुख देते हैं, वे (मूल्य) कैसे हैं, यह इसी पर निर्भर करता है कि किस तरह के रोगों से जीवन घिरता जा रहा है, अथवा किन रोगों को अपने निकट से निकट बुलाते जा रहे हो; और इन रोगों के आ जाने पर, किस दवा से तुम्हारे रोगों का शमन होगा ? यहाँ पर दवा कहने का अर्थ यह भी न समझना कि मैं किसी दवा का नाम या फिर इलाज करने वाले डॉक्टरों का [पृष्ठ 46]
नाम बताने जा रहा हूँ। इस विषय में तुम पूछोगे ही नहीं अगर मेरा कहा हुआ तुम्हें याद है कि मैं अपने इस प्रलय-रूप को, प्रलय-काल जब बना दूँगा, उस समय अत्यन्त ही भयंकर रोगों का फैलाव होगा।
तुम्हारे पापों के दण्ड रूप में जो रोग तुम्हें देने जा रहा हूँ, उससे बचाव का साधन संसार में किसी डॉक्टर, वैद्य, हकीम के पास नहीं होगा। ये रोग आये हैं पापों के कारण, तो जायेंगे पुण्यों के कारण।
ये ऐसे ही रोग होंगे जिनके लिये बचाव का कोई साधन संसार के किसी भी बड़े से बड़े डॉक्टर, वैद्य या हकीम के पास नहीं होगा, क्योंकि ये सभी कुछ तुम्हारे पापों के दंड रूप में ही, मैं देने जा रहा हूँ। ये अगर आये हैं तुम्हारे पापों के कारण, तो जायेंगे तुम्हारे पुण्यों के कारण। मगर वे पाप जो कर चुके हो या फिर करते रहते [पृष्ठ 47]
हो, वे पुण्य में बदले तो नहीं जा सकते हैं। फिर मैं जिस तरह पाप और पुण्य की बात कह रहा हूँ, वह इस प्रकार है कि पाप जो कर चुके हो, वे तो पुण्य में बदले जा ही नहीं सकते। इसलिये उनका दंड तो तुम्हें भोगना ही होगा।
पाप का बीज मन में ही समूल नष्ट कर दो।
वर्तमान में जो पाप का बीज मन में फल रहा है और जिन्हें कर्मों में परिणत करते रहते हो, उन्हें समूल मन में ही नष्ट कर दो और यही कार्य सत्य को धारण करने, असत्य को दूर करने का होता है। सम्भव न दिखते हुए भी, असम्भव नहीं होगा।
धोखा होता है, जब विश्वास की परिणति असत्य में होती है और वह दोहरे दंड का भागी होता है।
मगर यही असत्य अगर दूर भी करते रहोगे और सत्य को धारण करने के रूप में अपना चरित्र विश्वास रूप में दृढ़ [पृष्ठ 48]
होगा, तो कभी भी किसी विश्वास को, धोखे के नाम से अर्जित नहीं करोगे।
जब-जब विश्वास की परिणति असत्य में होती है, वह धोखा ही होता है। और इस तरह से दोहरे दंड का भागी बना देता है।
विश्वास देना और भूल जाना या फिर उसे गम्भीरता से न लेकर, पूरा न करने का स्वभाव बना लेना, ऐसा दुर्गुण है, जो तुम्हारी अपनी ही दृष्टि में पहचान में नहीं आता, किन्तु तुम्हारे चरित्र को इतना नीचे गिरा देता है कि मेरी दृष्टि में तुम्हारा कोई भी मूल्य रहता ही नहीं।
संसार में भले ही अपने को मूल्यवान समझते रहो, समाज और परिवार के सामने बड़ा सुन्दर भक्त का, भक्ति-भावना से भरा कर्मनिष्ठ व्यक्ति का रूप रखते रहो; यह समाज और परिवार, तुम्हें तुम्हारे अपराधों को समाप्त कराके दंड का भागी होने से बचा नहीं सकेगा। [पृष्ठ 49]
असत्य का स्वभाव होने से शरीर में रक्त के रोगों का आरम्भ हो रहा है।
यह शरीर जो असत्य को अपना स्वभाव रूप में अंग बना कर, हर पल संचित कर रहे हो, धीरे-धीरे (उसमें) रक्त के रोगों का आरम्भ हो रहा है। किन्तु जब यह रोग सारे रक्त को जब रोगी बना देगा, तब अपने अपराधों को याद करके अथवा मुझे अपना विश्वास देने का, वचन देने की बात कह कर भी, क्या पाओगे?
समय रहते ही, हर पाठ के साथ अपने आपको पहचानते हुए बदलते रहो। इसीलिए मैं तो कहता रहा हूँ कि वाणी तुम्हारे जीवन की ऐसी मर्यादा हो, जो तुम्हारी ही अपनी वाणी के द्वारा, हर पल तोड़ी न जाती रहे।
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