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2014 से 2026 तक भारत में कितने आतंकी हमले हुए? मोदी सरकार के दावों की तथ्य-जांच

क्या 2014 के बाद भारत में कितने आतंकी हमले हुए? पूरी फैक्ट चेक

भारत में कितने आतंकी हमले हुए? : देश में माहौल फैलाया गया है, मोदी ही हैं जिनकी वजह से आज देश में कोई आतंकी हमला नहीं होता। क्योंकि आज देश सुरक्षित हाथों में है।”

विपक्षी दलों का जवाब है : मोदी और अडानी को देश मानने वालों, पता है अभी 23 नवंबर को ही जम्मू-कश्मीर के राजौरी में हमारे 5 जवान शहीद हुए हैं। 13 सितंबर को ही आतंकी हमले में हमारे मेजर, कर्नल और डीएसपी शहीद हुए। इससे पहले 21 अप्रैल को इसी साल पुंछ आतंकी हमले में हमारे 5 जवान शहीद हुए। क्या तुम लोगों को यह आतंकी हमले नजर नहीं आते हैं?”

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“अरे! इक्का-दुक्का हमलों की बात और है यार…”

“इक्का-दुक्का? अरे कितने हमले गिनवाऊँ?

  • बेंगलुरु ब्लास्ट — 28 दिसंबर 2014
  • जम्मू अटैक — 20 मार्च 2015
  • मणिपुर अटैक — 5 जून 2015
  • गुरदासपुर अटैक — 27 जुलाई 2015
  • पठानकोट अटैक — 2 जनवरी 2016
  • पांपोर अटैक — 25 जून 2016
  • कोकराझार शूटिंग — 5 अगस्त 2016
  • उरी अटैक — 18 सितंबर 2016
  • बारामूला अटैक — 3 अक्टूबर 2016
  • हंदवाड़ा अटैक — 6 अक्टूबर 2016
  • नगरोटा आर्मी बेस अटैक — 29 नवंबर 2016
  • सुकमा अटैक — 24 अप्रैल 2017
  • भोपाल-उज्जैन पैसेंजर ट्रेन बमबारी — 7 मार्च 2017
  • अमरनाथ यात्रा अटैक — 11 जुलाई 2017
  • संजवान अटैक — 10 फरवरी 2018
  • सुकमा अटैक — 13 मार्च 2018
  • पुलवामा अटैक — 14 फरवरी 2019
  • जम्मू बस स्टैंड ग्रेनेड ब्लास्ट — 7 मार्च 2019
  • दंतेवाड़ा अटैक — 9 अप्रैल 2019
  • गढ़चिरौली नक्सल बमबारी — 1 मई 2019
  • कश्मीर हमला — 12 जून 2019
  • असम के डिब्रूगढ़ और चराईदेव में 4 बम ब्लास्ट — 26 जनवरी 2020
  • एचएमटी श्रीनगर टेरर अटैक
  • हैलाकांडी असम ट्विन बम ब्लास्ट — 3 फरवरी 2021
  • सुकमा-बीजापुर अटैक — 3 अप्रैल 2021
  • जम्मू ड्रोन अटैक — 27 जून 2021
  • बांदीपोरा कश्मीर टेरर अटैक — 4 अगस्त 2021
  • दीमा हसाओ असम टेरर अटैक — 27 अगस्त 2021
  • पुंछ-राजौरी अटैक — 20 अप्रैल 2023
  • दंतेवाड़ा बमबारी — 26 अप्रैल 2023

क्या ये इक्का-दुक्का हमले हैं? क्या इन सारी जगहों को, इन राज्यों को तुम लोग देश का हिस्सा नहीं मानते? या तुम लोग चीन की तरह आतंकवादियों को भी क्लीन चिट देना चाहते हो? फिर तो एक काम करो, मोदी से एक बयान जारी करवा दो, जैसे चीन के मामले में करवाया था— ‘ना हमारी सीमा में कोई आया, ना कोई आया था’। इसी तरह बोलवा दो— ‘ना कोई आतंकी हमला हुआ है, ना कोई शहीद हुआ है’।”

देश की सुरक्षा का सच: क्या वाकई बंद हो गए हैं आतंकी हमले?

सोशल मीडिया और राजनीतिक बहसों में अक्सर दावा किया जाता है कि एक निश्चित कार्यकाल के दौरान भारत में आतंकी और नक्सली हमले पूरी तरह थम गए हैं। हालांकि, जमीनी आंकड़े और रक्षा रिकॉर्ड इस राजनीतिक दावे से पूरी तरह मेल नहीं खाते। जब सुरक्षा और राष्ट्रवाद पर चर्चा होती है, तो कई बार दूर-दराज और सीमावर्ती इलाकों में हुए हमलों को अनदेखा कर दिया जाता है।

सीमावर्ती और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में लगातार सुरक्षा चुनौतियां

देश के कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों—जैसे जम्मू-कश्मीर, छत्तीसगढ़, और पूर्वोत्तर राज्यों में—सुरक्षा बलों को लगातार हमलों का सामना करना पड़ा है।

  • अनंतनाग मुठभेड (सितंबर 2023): कोकेरनाग के जंगलों में आतंकियों से लड़ते हुए कर्नल मनप्रीत सिंह, मेजर आशीष धोंचक और जम्मू-कश्मीर पुलिस के डीएसपी हुमायूं भट शहीद हो गए।
  • राजौरी और पुंछ सेक्टर: नवंबर 2023 में राजौरी मुठभेड़ में 5 जवान शहीद हुए, जबकि अप्रैल 2023 में पुंछ में सेना के वाहन पर हुए हमले में 5 जवान हताहत हुए।
  • पुलवामा हमला (2019): 14 फरवरी 2019 को हुए भयावह फिदायीन हमले में सीआरपीएफ के 40 जवान शहीद हुए थे।
  • सैन्य अड्डों पर हमले: पठानकोट (2016), उरी (2016), और संजवान (2018) जैसे सैन्य परिसरों को निशाना बनाया गया।
  • नक्सल हिंसा: छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा और सुकमा जिलों में आईईडी ब्लास्ट और घात लगाकर किए गए हमलों में सुरक्षा बलों को भारी क्षति पहुंची है।

राजनीतिक बयानबाज़ी बनाम ज़मीनी हक़ीक़त

अक्सर मुख्यधारा के मीडिया और शहरी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर असैनिक (civilian) बम धमाकों की कमी को ‘पूर्ण सुरक्षा’ मान लिया जाता है। लेकिन सीमा पर तैनात सैनिकों और नक्सल विरोधी अभियानों में शामिल जवानों के बलिदान को ‘अपवाद’ या ‘इक्का-दुक्का घटना’ कहकर खारिज करना उनके समर्पण पर सवाल उठाता है।

चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर 2020 की गलवान झड़प के बाद दिए गए राजनीतिक बयानों और आतंकवादी घटनाओं के आंकड़े यह दर्शाते हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा को केवल नारों और राजनीतिक आख्यानों के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। सुरक्षा नीतियों की वास्तविक समीक्षा के लिए तथ्यात्मक आंकड़ों और जमीनी सच्चाई को स्वीकार करना अनिवार्य है।






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