
पल-पल अपनी वाणी को जिस जिह्वा से तोड़ते रहते हो यह तुम्हारी जिह्वा रोगी हो जाती है। तुम्हारी इच्छा असत्य छोड़ने की ही नहीं वाणी की मर्यादा तोड़ना, दोष जैसा न भी लगता हो, मगर यह मर्यादा जब टूटती है या तोड़ी जाती है (पृष्ठ ५२) तब जीवन का रूप क्या होता है, यह देखने के लिये भी अभी से मानसिक रूप से तैयार रहो क्योंकि शरीर में असत्य के, अविश्वास के हिंसक जीवन के दोषों व अपराधों का घर बना हुआ है। यह तो वह कचरा ही है, जो जब सड़ता है, तो शरीर को रोगी बना देता है। यह बार-बार मेरे बताए जाने के बाद भी समझे कहाँ हो?