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CEC ज्ञानेश कुमार से इस्तीफे की मांग! SIR मामले में कांग्रेस और BJP आमने-सामने

Why-CEC-Gyanesh-Resignation

SIR मामले में कांग्रेस और BJP आमने-सामने : चुनाव आयोग के भीतर क्या हुआ, 13.3 करोड़ नामों का सच क्या है और Gyanesh Kumar पर क्यों उठे सवाल?

विशेष जांच | Hotlink News

नई दिल्ली | 1 अक्टूबर 2026

SIR मामले में कांग्रेस और BJP आमने-सामने : भारत में चुनाव केवल मतदान के दिन नहीं होते। चुनाव की पहली और सबसे महत्वपूर्ण सीढ़ी है—मतदाता सूची।

कौन वोट दे सकता है, किसका नाम सूची में है, किसका नाम हटाया गया, किसे दोबारा शामिल किया गया और किस आधार पर किसी नागरिक की पात्रता तय हुई—इन सवालों का सीधा संबंध लोकतंत्र के प्रतिनिधित्व से है।

इसीलिए 2025-26 में शुरू हुआ Special Intensive Revision यानी SIR अब केवल मतदाता सूची की प्रशासनिक कवायद नहीं रह गया है। इसके केंद्र में तीन बड़े सवाल खड़े हो चुके हैं।

क्या मतदाता सूचियों की गहन जांच (SIR) की आवश्यकता थी?

क्या इस प्रक्रिया में वैध मतदाताओं के बाहर रह जाने का पर्याप्त खतरा पैदा हुआ?

और सबसे महत्वपूर्ण—क्या चुनाव आयोग के भीतर SIR को लेकर वास्तविक संस्थागत मतभेद हुए?

विवाद की गंभीरता इसलिए भी बढ़ी क्योंकि दो Election Commissioners—Sukhbir Singh Sandhu और Vivek Joshi—से जुड़ी कथित 14 औपचारिक आपत्तियों की रिपोर्ट सामने आई। Election Commission ने दूसरी ओर कहा कि आंतरिक टिप्पणियां और असहमति लोकतांत्रिक संस्थागत deliberation का सामान्य हिस्सा हैं और अंतिम निर्णय आयोग ने वैधानिक प्रक्रिया के तहत सर्वसम्मति से लिए।

  1. SIR है क्या?

SIR यानी Special Intensive Revision of Electoral Rolls।

सामान्य revision की तुलना में यह मतदाता सूची की कहीं अधिक व्यापक जांच होती है। इसका उद्देश्य पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल करना, मृत व्यक्तियों के नाम हटाना, स्थान बदल चुके मतदाताओं की पहचान करना, duplicate entries को समाप्त करना और ऐसे लोगों को हटाना है जो कानून के अनुसार मतदाता बनने के पात्र नहीं हैं।

Election Commission ने बिहार में 2025 में SIR शुरू करते समय Article 324 और Representation of the People Act, 1950 की Section 21(3) का आधार लिया था। ECI ने बताया था कि बिहार में पिछली intensive revision 2003 में हुई थी और उसके बाद वर्षों तक मुख्यतः summary revisions हुए थे।

यानी मूल सवाल—क्या मतदाता सूची को समय-समय पर गहराई से साफ करना चाहिए—और SIR की वर्तमान प्रक्रिया की आलोचना, दो अलग-अलग प्रश्न हैं।

  1. SIR की शुरुआत बिहार से हुई और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा

24 जून 2025 को Election Commission ने बिहार की सभी विधानसभा सीटों में SIR का आदेश दिया।

विरोध करने वालों ने सवाल उठाया कि क्या ECI के पास इतनी व्यापक revision का अधिकार है? क्या इससे पुराने मतदाताओं पर नागरिकता साबित करने का अतिरिक्त बोझ आएगा? क्या सही प्रक्रिया अपनाई गई?

मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

27 मई 2026 को Supreme Court ने Association for Democratic Reforms बनाम Election Commission of India, 2026 INSC 564 मामले में बिहार SIR की वैधता को बरकरार रखा।

कोर्ट ने माना कि Article 324 और Representation of the People Act की Section 21(3) को पढ़ते हुए ECI के पास intensive revision करने की शक्ति है। कोर्ट ने यह भी कहा कि SIR का उद्देश्य electoral rolls की accuracy, completeness और integrity बनाए रखना एक वैध उद्देश्य है और बिहार में अपनाई गई प्रक्रिया proportionality की कसौटी पर खरी उतरती है।

लेकिन इस फैसले को एक दूसरी वजह से भी समझना जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट ने ECI को नागरिकता का अंतिम निर्णायक प्राधिकारी नहीं बनाया।

कोर्ट ने कहा कि ECI electoral-roll eligibility के लिए citizenship की limited inquiry कर सकता है। यदि नागरिकता को लेकर गंभीर प्रश्न हो तो अंतिम निर्णय संबंधित competent authority के पास जाएगा। कोर्ट ने deleted persons को notice और hearing का अवसर देने तथा कुछ मामलों में पुनः inclusion के रास्ते भी स्पष्ट किए।

इसलिए यह कहना भी गलत होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने ECI को बिना सीमा नागरिकता तय करने की शक्ति दे दी।

  1. फिर 13.3 करोड़ नामों का विवाद क्या है?

यही इस पूरे विवाद का सबसे राजनीतिक हिस्सा है।

विभिन्न SIR draft rolls के आधार पर 13 करोड़ से अधिक entries draft rolls में नहीं आईं या बाहर रह गईं। Indian Express ने अगस्त-सितंबर 2026 में यह संख्या लगभग 13.37 करोड़ बताई।

Congress और INDIA bloc इस संख्या को बड़े पैमाने पर deletion के रूप में पेश कर रहे हैं।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी और प्रशासनिक फर्क है।

Draft roll से बाहर होना हमेशा अंतिम deletion नहीं होता।

उदाहरण के लिए महाराष्ट्र में 9.79 करोड़ electors की पिछली सूची के मुकाबले 31 अगस्त 2026 की draft roll में 7.72 करोड़ नाम शामिल हुए।

लगभग 2.07 करोड़ लोगों के enumeration forms जमा नहीं हो सके।

लेकिन ECI ने स्पष्ट किया कि इसे final deletion नहीं माना जा सकता और affected electors claims और objections के जरिए inclusion मांग सकते हैं।

यही फर्क इस विवाद को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।

इसलिए “13.3 करोड़ वोट हमेशा के लिए खत्म” कहना उपलब्ध रिकॉर्ड से साबित नहीं होता।

सही पत्रकारिता वाली भाषा होगी कि SIR के draft rolls में 13 करोड़ से अधिक नाम बाहर रह गए या draft में शामिल नहीं हुए; इनमें से कितने अंतिम रूप से हटेंगे और कितने पुनः शामिल होंगे, यह claims, objections, hearings और final rolls की प्रक्रिया से तय होगा।

4. Election Commission के भीतर 14 आपत्तियों का विवाद

सितंबर 2026 में Indian Express की एक investigative report ने Election Commission के भीतर की कार्यप्रणाली को लेकर बड़ा सवाल उठाया।

रिपोर्ट के अनुसार Election Commissioners Sukhbir Singh Sandhu और Vivek Joshi ने नवंबर 2025 से सितंबर 2026 के बीच लगभग 14 मौकों पर आयोग के विभिन्न निर्णयों और प्रक्रियाओं पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं।

इनमें कथित तौर पर SIR से जुड़े निर्णय, Form 6 में बदलाव, electoral-roll database तक access, centralisation of voter data, नए मतदाताओं के registration की प्रक्रिया, software और technical issues तथा कुछ अन्य administrative decisions शामिल थे।

Indian Express के अनुसार दोनों Commissioners ने यह सवाल भी उठाया कि कुछ महत्वपूर्ण निर्णयों में उनकी भूमिका और जानकारी पर्याप्त थी या नहीं।

यह दावा अपने आप में चुनाव में धांधली का प्रमाण नहीं है।

लेकिन यह एक गंभीर institutional transparency question जरूर पैदा करता है।

क्या तीन सदस्यीय संवैधानिक आयोग के महत्वपूर्ण निर्णय पर्याप्त सामूहिक प्रक्रिया से लिए गए?

5. Election Commission का जवाब क्या है?

Election Commission ने इन घटनाओं को institutional breakdown मानने से इनकार किया।

EC का कहना है कि internal notes, observations, queries, technical objections और legal comments संस्थागत decision-making का सामान्य हिस्सा हैं।

EC ने यह भी कहा कि internal deliberation और final decision को एक ही चीज नहीं माना जा सकता।

आयोग के अनुसार SIR से जुड़े final decisions unanimously लिए गए और उन्हें कानूनी आधार प्राप्त था।

इसलिए फिलहाल दो अलग-अलग narratives सामने हैं।

विपक्ष का कहना है कि दो Commissioners की बार-बार आपत्तियां दिखाती हैं कि निर्णय प्रक्रिया में गंभीर संस्थागत समस्या थी।

ECI का कहना है कि आंतरिक deliberation को dissent के रूप में पेश करना गलत है और अंतिम निर्णय आयोग के सामूहिक निर्णय थे।

इन दोनों के बीच अंतिम कानूनी निष्कर्ष अभी न्यायिक प्रक्रिया का विषय है।

Form 6 विवाद—छोटा बदलाव या बड़ी संवैधानिक बहस?

Form 6 वह form है जिसका उपयोग नए मतदाता के रूप में नाम दर्ज कराने के लिए किया जाता है।

2026 में ECINet portal पर Form 6 से जुड़ी एक additional declaration ने विवाद खड़ा किया।

रिपोर्टों के अनुसार नए आवेदकों से SIR से जुड़े पुराने electoral-roll information के बारे में जानकारी मांगी गई।

कथित विकल्पों में यह जानना शामिल था कि क्या आवेदक का नाम पिछली intensive revision में था, क्या माता-पिता या grandparents का नाम उस सूची में था, या परिवार का नाम उस पुरानी सूची में नहीं था।

दो Election Commissioners ने इस बदलाव की legality और practical implications पर आपत्ति जताई, विशेषकर first-time young voters पर अतिरिक्त burden को लेकर।

Form 6 पर असली कानूनी सवाल क्या है?

Opposition का आरोप है कि statutory Form 6 में ऐसा बदलाव किया गया जिसे उचित वैधानिक प्रक्रिया के बिना लागू नहीं किया जा सकता था।

लेकिन Election Commission ने कहा कि Form 6 itself बदला नहीं गया, बल्कि उसके साथ एक additional declaration जोड़ी गई थी।

यह distinction तकनीकी लग सकता है, लेकिन कानूनी रूप से महत्वपूर्ण है।

सवाल केवल यह नहीं है कि website पर कौन-सा field दिखाई दे रहा था।

सवाल यह है कि क्या उस additional declaration को statutory requirement की तरह लागू किया जा सकता था?

Indian Express ने रिपोर्ट किया कि संबंधित section को mandatory label नहीं किया गया था, लेकिन applicant उस प्रश्न का उत्तर दिए बिना submission आगे नहीं बढ़ा पा रहा था।

यही वह बिंदु है जिसने विवाद को प्रशासनिक सुविधा से उठाकर statutory authority और due process का प्रश्न बना दिया।

Form 6 से जुड़ी requirement हटाई गई

सितंबर के अंत में विवाद और बढ़ा।

रिपोर्टों के अनुसार Election Commission ने उन राज्यों में जहां SIR पूरा हो चुका है, online Form 6 से SIR-related additional declaration को हटाने का फैसला किया।

यह कदम उन reports के बाद आया जिनमें दो Commissioners की आपत्तियों का उल्लेख था।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि ECI ने SIR की पूरी प्रक्रिया को अवैध मान लिया।

यह एक महत्वपूर्ण administrative adjustment था।

यही distinction रिपोर्टिंग में बनाए रखना जरूरी है।

क्या Gyanesh Kumar अकेले फैसले ले रहे थे?

यह सबसे गंभीर आरोपों में से एक है।

Opposition का कहना है कि CEC Gyanesh Kumar ने ऐसे मामलों में निर्णय लिए जिनमें पूरे Commission की भागीदारी आवश्यक थी।

एक petition सुप्रीम कोर्ट के सामने भी है जिसमें आरोप लगाया गया है कि Article 324 और 2023 के कानून के तहत Commission की collective decision-making प्रक्रिया का पालन होना चाहिए और CEC अकेले Commission की शक्तियां exercise नहीं कर सकते।

सुप्रीम कोर्ट ने इस petition को सुनने पर सहमति जताई है।

लेकिन यहां महत्वपूर्ण सावधानी जरूरी है।

किसी petition का Supreme Court द्वारा सुनना यह साबित नहीं करता कि petition में लगाए गए आरोप सही हैं।

यह केवल यह बताता है कि न्यायिक जांच का प्रश्न अदालत के सामने आ गया है।

कानून क्या कहता है—क्या Commissioners असहमत हो सकते हैं?

हां।

Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act, 2023 की Section 18 के अनुसार Commission का काम जहां तक संभव हो unanimity से होना चाहिए।

लेकिन अगर unanimity नहीं बनती तो majority का रास्ता मौजूद है।

तीन सदस्यीय Commission में इसका अर्थ है कि दो Commissioners की majority निर्णय निर्धारित कर सकती है।

इसलिए केवल यह तथ्य कि किसी Commissioner ने आपत्ति दर्ज की, अपने आप में decision को अवैध नहीं बना देता।

लेकिन वर्तमान विवाद का अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या आपत्तियों के बावजूद अंतिम निर्णय वास्तव में Commission के सामूहिक अधिकार के तहत लिए गए थे?

यही प्रश्न अब राजनीतिक बहस के साथ-साथ न्यायिक scrutiny का हिस्सा बन रहा है।

Congress और INDIA bloc का आरोप

Congress ने इस पूरे घटनाक्रम को Election Commission की institutional independence और electoral transparency से जोड़ दिया है।

Congress Working Committee ने 29 सितंबर को CEC Gyanesh Kumar के resignation की मांग, SIR को रोकने की मांग, draft rolls से बाहर किए गए नामों को restore करने की मांग, voter-roll data को अधिक पारदर्शी बनाने और electoral process में greater accountability की मांग उठाई।

Congress ने लगभग 13.30 करोड़ नामों को हटाए जाने का दावा भी दोहराया।

लेकिन यह संख्या और deletion की उसकी characterization राजनीतिक विवाद का विषय है, क्योंकि draft-roll exclusion और final deletion एक ही चीज नहीं हैं।

30 सितंबर को INDIA bloc की बैठक में भी SIR, Election Commission और CEC की भूमिका पर संयुक्त राजनीतिक रणनीति पर चर्चा हुई।

Bloc ने 2 से 8 अक्टूबर तक Save Democracy campaign की घोषणा की और Gyanesh Kumar के resignation की मांग दोहराई।

BJP का पलटवार—Smriti Irani ने क्या कहा?

BJP ने Congress के आरोपों को स्वीकार नहीं किया।

BJP leader Smriti Irani ने आरोप लगाया कि Congress Election Commission पर तब सवाल उठाती है जब परिणाम उसके पक्ष में नहीं आते, जबकि जिन राज्यों में BJP सत्ता में नहीं है वहां उसी Election Commission की प्रक्रिया से हुए चुनावों को स्वीकार करती रही है।

उन्होंने सवाल उठाया कि यदि voter-roll cleaning गलत है तो मृत और duplicate voters के नाम electoral rolls में क्यों बने रहने दिए जाएं।

Irani ने विशेष रूप से Karnataka, Himachal Pradesh, Punjab और Kerala जैसे राज्यों का हवाला देते हुए Congress के कथित double standards पर सवाल उठाया।

यह BJP का राजनीतिक तर्क है।

इसका अर्थ यह नहीं कि इससे SIR से संबंधित specific legal या procedural allegations अपने आप गलत साबित हो जाते हैं।

उसी तरह विपक्ष के आरोप भी अपने आप यह साबित नहीं करते कि ECI ने चुनावों में हेरफेर किया।

दोनों दावों को अलग-अलग evidence के आधार पर जांचना होगा।

SIR के पक्ष में सबसे मजबूत तर्क क्या है?

Election Commission और SIR समर्थकों का मूल तर्क सीधा है।

मतदाता सूची शुद्ध नहीं होगी तो चुनाव की विश्वसनीयता पर सवाल उठेंगे।

मृत व्यक्ति, duplicate entries, permanently shifted voters और ineligible persons के नाम electoral roll में बने रहना भी समस्या है।

बिहार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी माना कि accurate और complete electoral roll एक legitimate constitutional objective है और ECI को intensive revision की शक्ति है।

इस दृष्टिकोण से SIR को केवल नाम काटने की प्रक्रिया के रूप में देखना अधूरा होगा।

SIR के खिलाफ सबसे मजबूत चिंता क्या है?

विपक्ष और आलोचकों का सबसे महत्वपूर्ण तर्क यह नहीं है कि voter lists को कभी साफ नहीं किया जाना चाहिए।

बल्कि चिंता यह है कि कहीं eligible citizen को administrative error, document problem, migration, spelling mismatch, mapping failure या procedural confusion के कारण vote से वंचित न कर दिया जाए।

यह चिंता खासकर तब महत्वपूर्ण हो जाती है जब लाखों या करोड़ों records एक साथ review किए जा रहे हों।

महाराष्ट्र में draft roll के दौरान 2.07 करोड़ enumeration forms जमा न होने का उदाहरण दिखाता है कि बड़े पैमाने की exercise में genuine voters भी temporarily बाहर रह सकते हैं।

Pune में भी SIR notices, 2002 roll mapping और logical discrepancies को लेकर voters के बीच confusion की reports सामने आईं।

यही कारण है कि notice, hearing, correction और appeal की प्रक्रिया केवल bureaucratic formality नहीं है।

यह voter protection mechanism है।

एक और बड़ा सवाल—डेटा किसके पास है?

Election roll अब केवल कागज की सूची नहीं है।

यह विशाल digital database है।

Indian Express की investigation में centralisation और access to electoral database को लेकर भी Commissioners की आपत्तियों का उल्लेख हुआ।

यदि electoral database में कौन जोड़ा गया, कौन हटाया गया, किस आधार पर हटाया गया, किसने बदलाव किया, किस officer ने approve किया और appeal के बाद क्या बदला जैसी जानकारी audit trail के रूप में उपलब्ध हो, तो विवादों की स्वतंत्र जांच आसान हो सकती है।

यही कारण है कि transparency का प्रश्न केवल राजनीतिक दलों की मांग नहीं है।

यह आधुनिक election administration का मूल governance question भी है।

क्या SIR केवल BJP बनाम Congress की लड़ाई है?

नहीं।

यह विवाद तीन अलग-अलग स्तरों पर चल रहा है।

पहला—राजनीतिक स्तर।

Congress और INDIA bloc इसे electoral democracy और institutional independence का प्रश्न बता रहे हैं।

BJP इसे voter-roll purification के खिलाफ राजनीतिक resistance के रूप में प्रस्तुत कर रही है।

दूसरा—संस्थागत स्तर।

दो Election Commissioners की कथित आपत्तियों ने Commission के internal decision-making पर सवाल पैदा किया है।

तीसरा—कानूनी स्तर।

Supreme Court पहले ही बिहार SIR की मूल वैधता पर फैसला दे चुका है, जबकि CEC के decision-making और वर्तमान प्रक्रियाओं से संबंधित नए प्रश्न फिर अदालत के सामने आ रहे हैं।

यही कारण है कि इस विवाद को केवल Congress बनाम BJP की कहानी बनाना इसके संवैधानिक आयाम को छोटा कर देगा।

सबसे महत्वपूर्ण Fact Check

दावा: SIR पूरी तरह गैरकानूनी है।

तथ्य: बिहार SIR को Supreme Court ने वैध माना है।

दावा: ECI को intensive revision का अधिकार नहीं है।

तथ्य: Supreme Court ने Article 324 और Section 21(3) के तहत ECI की शक्ति स्वीकार की है।

दावा: 13.3 करोड़ वोट स्थायी रूप से खत्म हो गए।

तथ्य: यह निष्कर्ष उपलब्ध रिकॉर्ड से सिद्ध नहीं है। बड़ी संख्या draft rolls में बाहर रही और claims तथा objections की प्रक्रिया मौजूद है।

दावा: दो Commissioners ने सवाल उठाए।

तथ्य: Indian Express ने 14 occasions पर formal objections की रिपोर्ट की है।

दावा: ECI ने कहा कि final decisions unanimous थे।

तथ्य: हां, ECI ने यही आधिकारिक position रखी है।

दावा: Form 6 में विवाद हुआ।

तथ्य: हां, SIR-related additional declaration को लेकर गंभीर विवाद हुआ।

दावा: Form 6 से संबंधित बदलाव वापस हुआ।

तथ्य: completed SIR states में additional requirement वापस लेने की रिपोर्ट है।

दावा: Supreme Court ने Gyanesh Kumar को दोषी माना।

तथ्य: ऐसा कोई निष्कर्ष नहीं है। उनकी functioning को चुनौती देने वाली petition पर न्यायिक सुनवाई का प्रश्न सामने आया है।

दावा: SIR का उद्देश्य केवल वोट काटना है।

तथ्य: यह राजनीतिक आरोप है। ECI का घोषित उद्देश्य eligible voters को शामिल करना और ineligible entries को हटाना है।

अब असली जांच किन सवालों की होनी चाहिए?

Hotlink News की investigative नजर से देखें तो राजनीतिक नारों से आगे जाकर पांच दस्तावेज सार्वजनिक बहस में सबसे महत्वपूर्ण होंगे।

पहला सवाल—हर राज्य में draft roll से बाहर हुए प्रत्येक category के नाम कितने हैं?

Death, migration, duplication, non-submission, mapping failure, logical discrepancy और suspected ineligibility—इनकी अलग-अलग संख्या कितनी है?

दूसरा सवाल—13.3 करोड़ के आंकड़े में कितने नाम वास्तव में final rolls से हटे?

और कितने बाद में वापस शामिल हुए?

तीसरा सवाल—14 objections में प्रत्येक objection क्या था?

किस Commissioner ने क्या आपत्ति की?

CEC या Commission ने उसका क्या जवाब दिया?

चौथा सवाल—Form 6 में additional declaration किस authority से मंजूर हुई?

उसका legal basis क्या था?

और उसे कुछ राज्यों में वापस लेने का कारण क्या था?

पांचवां सवाल—क्या ECI के पास प्रत्येक deletion का complete digital audit trail है?

यदि है, तो क्या political parties और public के लिए उसका audit-friendly version उपलब्ध कराया जा सकता है?

Election Commission की विश्वसनीयता का असली परीक्षण

Election Commission की विश्वसनीयता केवल इस बात से तय नहीं होगी कि वह कितने duplicate voters हटाता है।

और केवल इस बात से भी तय नहीं होगी कि विपक्ष उस पर कितना आरोप लगाता है।

विश्वसनीयता के लिए तीन चीजें साथ-साथ चाहिए।

Accurate electoral roll + Due process + Transparent decision-making

यदि duplicate और मृत लोगों के नाम हटते हैं, लेकिन genuine voters भी बिना पर्याप्त notice के बाहर हो जाते हैं—तो समस्या है।

यदि genuine voters सुरक्षित रहते हैं लेकिन मृत और duplicate entries बनी रहती हैं—तो भी समस्या है।

और यदि Commission सही काम कर रहा है लेकिन उसके निर्णयों की प्रक्रिया सार्वजनिक रूप से समझाई नहीं जाती—तो trust deficit पैदा हो सकता है।

निष्कर्ष: SIR की लड़ाई आखिर किस बात की है?

पहली नजर में यह विवाद voter-list revision का दिखाई देता है।

लेकिन गहराई में जाने पर यह तीन संस्थागत सवालों की लड़ाई बन जाता है।

किसे मतदाता माना जाए?

किस आधार पर उसका नाम हटाया जाए?

और वह निर्णय लेने की शक्ति किस प्रक्रिया के तहत इस्तेमाल की जाए?

Supreme Court ने 27 मई 2026 को यह स्पष्ट कर दिया कि Election Commission को intensive revision करने की संवैधानिक और वैधानिक शक्ति है।

लेकिन उसी न्यायिक ढांचे में यह भी महत्वपूर्ण है कि existing entries को बिना due process हल्के में नहीं हटाया जा सकता और citizenship के सवालों में ECI की inquiry की सीमाएं हैं।

अब सितंबर-अक्टूबर 2026 का नया विवाद एक और प्रश्न सामने ला रहा है।

क्या ECI की multi-member institutional decision-making वास्तव में उतनी पारदर्शी है जितनी होनी चाहिए?

इसका उत्तर राजनीतिक मंचों से नहीं, बल्कि official records, dissent notes, final orders, voter-level data, claims-and-objections records और judicial scrutiny से निकलना चाहिए।

Hotlink News के लिए इस कहानी की सबसे अहम लाइन यही है।

SIR की जरूरत पर बहस अलग मुद्दा है; SIR कैसे किया गया, किसका नाम क्यों बाहर हुआ और फैसले किस प्रक्रिया से लिए गए—यह अलग और कहीं अधिक महत्वपूर्ण जांच का विषय है।

और जब मामला करोड़ों मतदाताओं के नाम से जुड़ा हो, तो लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं होना चाहिए कि किस पार्टी को फायदा या नुकसान होगा।

विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR/Special Intensive Revision) और मतदाता सूची से नाम हटाए जाने (Voter Deletions) के मुद्दों पर मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। कांग्रेस (इंडिया गठबंधन) और बीजेपी के बीच आरोप-प्रत्यारोप और उनके मुख्य तर्क इस प्रकार हैं:

कांग्रेस और इंडिया (INDIA) गठबंधन के मुख्य आरोप

  1. CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग: कांग्रेस कार्यकारिणी (CWC) और इंडिया गठबंधन ने प्रस्ताव पारित कर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के तुरंत इस्तीफे या उन्हें पद से हटाने तथा एसआईआर (SIR) प्रक्रिया को रोकने की मांग की है।
  2. लाखों/करोड़ों वोटरों के नाम हटाने का दावा: विपक्ष का आरोप है कि एसआईआर की आड़ में बड़े पैमाने पर फर्जी और लक्षित तरीके से (Targeted Deletions) वैधानिक मतदाताओं के नाम सूची से काटे गए हैं।
  3. एकतरफा फैसले व वैधानिक फॉर्म (Form 6) में बदलाव:कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि चुनाव आयोग ने वैधानिक नियमों और फॉर्म 6 के उपयोग से जुड़े नियमों में एकतरफा बदलाव किए हैं और चुनाव आयुक्तों के बीच भी आंतरिक असहमति रही है।

भारतीय जनता पार्टी (BJP) और सरकार का जवाब

  1. विपक्ष के दोहरे मापदंड: बीजेपी नेताओं (जैसे स्मृति ईरानी व सुधांशु त्रिवेदी) का कहना है कि जब विपक्ष चुनाव जीतता है तब वह आयोग पर भरोसा जताता है, लेकिन हार के डर से वह संवैधानिक संस्थाओं पर बेबुनियाद सवाल उठाता है।
  2. ऐतिहासिक संदर्भ (SIR का इतिहास): बीजेपी का तर्क है कि देश में 1951 से 2004 के बीच अब तक 8 बार एसआईआर (SIR) हो चुका है, जिनमें से 7 बार कांग्रेस की सरकारों (नेहरू, शास्त्री, इंदिरा, राजीव व मनमोहन सिंह के कार्यकाल) के दौरान ही कराया गया था।
  3. संवैधानिक दायित्व: बीजेपी के अनुसार, संविधान के अनुच्छेद 324 और 327 के तहत शुद्ध और पारदर्शी मतदाता सूची तैयार करना और सुधारना चुनाव आयोग का संवैधानिक दायित्व है।

चुनाव आयोग (ECI) का पक्ष

  • चुनाव आयोग ने विपक्षी आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि एसआईआर से जुड़े सभी निर्णय आयोग द्वारा सर्वसम्मति से लिए गए हैं और नियमों में संशोधन कानून के दायरे में किए गए हैं।

सबसे महत्वपूर्ण सवाल होना चाहिए।

क्या हर पात्र नागरिक का वोट सुरक्षित है, और क्या हर अपात्र entry को हटाने की प्रक्रिया कानून, पारदर्शिता और अपील के अधिकार के साथ चल रही है?

यही सवाल SIR विवाद का वास्तविक केंद्र है।

HOTLINK NEWS — INVESTIGATIVE NOTE

स्थिति: 1 अक्टूबर 2026 तक उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड के आधार पर।

इस रिपोर्ट में राजनीतिक दलों के आरोपों को तथ्य के रूप में नहीं बल्कि attributed claims के रूप में प्रस्तुत किया गया है। जहां ECI और विपक्ष की स्थिति अलग है, दोनों पक्षों को अलग-अलग दर्ज किया गया है। 13.3 करोड़ का आंकड़ा draft-roll exclusions/deletions के राजनीतिक विवाद से जुड़ा है; इसे अंतिम और स्थायी disenfranchisement के बराबर नहीं माना जाना चाहिए।

मुख्य स्रोत: Election Commission of India; Supreme Court of India, Association for Democratic Reforms v. Election Commission of India, 2026 INSC 564; India Today; Moneycontrol; Indian Express.






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