दिल्ली पुलिस के अधिकारी द्वारा महिला पत्रकार के यौन उत्पीड़न पर उठे गंभीर सवाल: कानून के रखवालों की यह दुस्साहस बर्दाश्त से बाहर

हॉटलिंक न्यूज (विशेष रिपोर्ट) / नई दिल्ली: दिल्ली पुलिस के अधिकारी द्वारा महिला पत्रकार के यौन उत्पीड़न पर उठे गंभीर सवाल : 4 अक्टूबर की रात दिल्ली पुलिस और कानून व्यवस्था पर एक ऐसा कलंक लगा, जिसने पूरे पत्रकारिता जगत और आम नागरिकों को झकझोर कर रख दिया है। अपनी ड्यूटी निभा रही एक स्वतंत्र (इंडिपेंडेंट) महिला पत्रकार, रोज़ी के साथ दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी (विवेक भगत) द्वारा यौन उत्पीड़न का मामला सामने आया है।
सवाल यह उठता है कि जिस वर्दी पर जनता की सुरक्षा का जिम्मा है, उसके पीछे छिपे ऐसे अधिकारियों की यह हिम्मत कैसे हुई?
देर रात पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने के बाहर प्रदर्शन
घटना के विरोध में और पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए देर रात 1 बजे पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने के बाहर पत्रकारों, वकीलों और आम प्रदर्शनकारियों का जमावड़ा लग गया। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि रोज़ी लगातार सामाजिक आंदोलनों और जमीनी मुद्दों को कवर करती रही हैं। अपनी ड्यूटी के दौरान उनके साथ हुई यह शर्मनाक हरकत दिल्ली पुलिस के मुंह पर करारा तमाचा है।
- सुल्तानपुर में खौफनाक डबल मर्डर (double murder in sultanpur news): चोरी पकड़ने पर ड्राइवर ने ही कर दी शिक्षक दंपत्ति की हत्या
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कर्तव्य जब जान से भी बड़ा हो जाए! 🚁✈️ आसमान में 170 से ज़्यादा ज़िंदगियों को बचाने वाले कैप्टन स्मित की अभूतपूर्व बहादुरी की कहानी। #FlyDubai #HeroCaptain #AviationHero #SmitMachchhar तेल अवीव/दुबई: दुबई से तेल अवीव (इज़राइल) जा रही फ्लाईदुबई (Flydubai) की फ्लाइट में mid-air हॉरर के दौरान एक बड़ी त्रासदी टल गई। विमान के भारतीय मूल के कैप्टन स्मित (Smit Machchhar) ने जानलेवा हमले और गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद साहस दिखाते हुए 170 से अधिक यात्रियों की जान बचा ली। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस घटना के बादRead More
पुलिस का ढुलमुल रवैया और आरोपी का बचाव?
प्रदर्शन कर रहे पत्रकारों और प्रतिनिधियों ने सीधे तौर पर आरोप लगाया कि दिल्ली पुलिस अपने ही आरोपी अधिकारी को बचाने का प्रयास कर रही है। कानून के अनुसार यौन उत्पीड़न की शिकायत मिलते ही तुरंत प्राथमिकी (FIR) दर्ज की जानी चाहिए। इसके बावजूद पुलिस सीसीटीवी फुटेज देखने और जांच के नाम पर टालमटोल कर रही है।
आरोपियों के इतिहास को लेकर भी गंभीर खुलासे हुए हैं। बताया जा रहा है कि संबंधित आईपीएस अधिकारी के खिलाफ पहले भी यौन उत्पीड़न की शिकायतें आ चुकी हैं। इसके बावजूद ऐसे अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई न होना पुलिस प्रशासन की नीयत पर बड़े सवाल खड़े करता है।
उठते गंभीर सवाल:
- सुरक्षा देने वाले ही भक्षक क्यों? जब एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी ऑन-ड्यूटी महिला पत्रकार का यौन उत्पीड़न कर सकता है, तो आम महिलाओं की सुरक्षा का क्या?
- FIR दर्ज करने में देरी क्यों? सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद यौन उत्तपीड़न के इस मामले में तत्काल प्राथमिकी दर्ज क्यों नहीं की गई?
- क्या वर्दी वालों के लिए अलग कानून है? आरोपी का पिछला रिकॉर्ड जानते हुए भी उसे शह क्यों दी जा रही है?
दिल्ली पुलिस की संदिग्ध कार्यप्रणाली और विभागीय लीपापोती
दिल्ली में देश की शीर्ष मीडिया संस्थाओं, संसद और न्यायपालिका के केंद्र में ऐसी घटना का होना राजधानी की कानून-व्यवस्था पर गंभीर धब्बा है। प्रदर्शनकारियों का स्पष्ट कहना है कि दिल्ली पुलिस अपने ही कैडर के प्रभाव को देखते हुए ‘प्रोटेक्टिव शील्ड’ की तरह काम कर रही है। जब सुप्रीम कोर्ट का ‘ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार’ मामला स्पष्ट रूप से कहता है कि संज्ञेय (Cognizable) और विशेषकर महिलाओं से जुड़े यौन उत्पीड़न के मामलों में बिना किसी पूर्वाग्रह के तत्काल प्राथमिक दर्ज होनी चाहिए, तब दिल्ली पुलिस का फुटेज खंगालने और प्राथमिक जांच का बहाना बनाना सीधे तौर पर प्रक्रियात्मक उल्लंघन है। पुलिस का यह रवैया दिखाता है कि जब आरोपी महकमे के भीतर का ही उच्च पदस्थ अधिकारी हो, तो जवाबदेही के तय मापदंड पूरी तरह धराशायी हो जाते हैं।
बिहार में पुलिस की निष्क्रियता और प्रशासनिक उदासीनता
दिल्ली से परे, बिहार में भी महकमे की कार्यशैली पर लगातार सवाल खड़े होते रहे हैं। बिहार के विभिन्न जिलों से अक्सर ऐसी शिकायतें सामने आती हैं जहां महिलाओं और महिला पत्रकारों द्वारा दी गई शिकायतों को दबाने या आरोपी पक्ष को फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से प्राथमिकी दर्ज करने में हीला-हवाली की जाती है। पुलिस प्रशासन द्वारा त्वरित कार्रवाई करने के बजाय पीड़ित को समझौता करने का अप्रत्यक्ष दबाव बनाना या फाइल दबाकर बैठ जाना, पीड़िता को दोबारा प्रताड़ित करने जैसा है। दिल्ली और बिहार दोनों जगहों की पुलिस का यह उदासीन रवैया राज्य प्रायोजित पितृसत्तात्मक मानसिकता और अपने कर्मचारियों को बचाने के ‘संस्थागत संरक्षण’ (Institutional Protection) को उजागर करता है। जब तक बिहार से लेकर दिल्ली तक पुलिस बल में जवाबदेही तय नहीं होगी और दागी अधिकारियों को बेनकाब नहीं किया जाएगा, तब तक आम जनमानस का पुलिस व्यवस्था से भरोसा उठना स्वाभाविक है।
एकजुटता और आगे का आह्वान
पत्रकार समुदाय और प्रदर्शनकारियों ने स्पष्ट कर दिया है कि अब इस तरह की गुंडागर्दी और यौन उत्पीड़न को बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। थाने के बाहर मौजूद लोगों ने अपील की है कि निष्पक्ष कार्रवाई और FIR की कॉपी मिलने तक यह लड़ाई जारी रहेगी। सभी पत्रकारों, वकीलों और नागरिकों से आग्रह किया गया है कि वे पीड़िता के समर्थन में आगे आएं और पुलिस प्रशासन की इस मनमानी के खिलाफ आवाज उठाएं।
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